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जवान बेटे को बंधा देख पिता की आँखों से निकले दर्द के आँसू

रिपोर्टर @ गणेश जैन जैसलमेर/फलसूण्ड। 23 साल पूर्व परिवार में लड़का होने पर परिवार वालो ने खुशियां। बांटी घर में पुत्र होने पर परिवार व...

रिपोर्टर @ गणेश जैन

जैसलमेर/फलसूण्ड। 23 साल पूर्व परिवार में लड़का होने पर परिवार वालो ने खुशियां। बांटी घर में पुत्र होने पर परिवार वाले खुश हुए। बच्चा धीरे धीरे बड़ा होने लगा तब परिवार वालो कुछ पता नहीं चला पांच साल का होने पर मानो इस परिवार पर ग्रहण लग गया। बच्चा नहीं बोलने व अजीबोगरीब हरकत करने पर चिंता सताने लगी। इधर उधर भोपो के पास गए लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला। पांच साल से 15 वर्ष की उम्र तक यानि दस वर्ष तक चारपाई पर लेटा रहा।
घर में रस्सी से बंधा पीड़ित
शिवदानपुरी महाराज की समाधी के फेरी लगाने पर चलना फिरना शुरू किया लेकिन मानसिंक रूप से परिपक नहीं होने के कारण कभी कभी पागलपन के दौरे पड़ने के कारण परिवार वालो ने घर में ही कैद करके रखा है इस डर से की कही किसी को नुकसान नहीं कर दे इस कारण बांधकर रखा है। नेतासर गांव मे 8 सालो से एक युवक सर्दी हो या गर्मी हर मौसम में घर के अंदर बंधा हुआ रहता है। मानसिक रूप से पीड़ीत इस युवक के इलाज के लिये पिता ने जितना बन पड़ा खर्च करके इलाज करावाया लेकिन रूपये खत्म हो गये मगर पुत्र का इलाज नही हो पाया। अधेड़ पिता को मजबूर होकर अपने पुत्र को घर में बाध करके रखना पड़ता है। एक ओर सरकार के द्वारा लाखो करोड़ों रूपये खर्च करके दिव्यागो के लिये योजनाऐ चलाई जाती है। वही नेतासर का युवक भगवानाराम अपने परिवार की आर्थिक हालत के चलते घर में बंधे रहने पर  मजबूर है। इसके परिवार में एक ओर भाई है जो परिवार का खर्चा मजदूरी करके चलाता है।
मानसिक रोगी भगवानाराम
नेतासर गांव के रहने वाले 45 वर्षीय अधेड़ अमानाराम की आँखे अपने किशोर अवस्था के पुत्र भगवानाराम  को घर से बंधा हुआ देख करके आँसुओ से भर आती है। रूपये पैसे की आर्थिक स्थिति से कमजोर होने के चलते जुकाम बुखार के इलाज के रूपये भी जुटाना जहा टेढी खीर हो वहा मानसिक रोग के लिये हजारो रूपये जुटाना कहा संभव है। कोई दानदाता या संस्था इस मानसिक रूप से पीड़ीत के इलाज के लिये आगे आकर इसको घर की चारदिवारी के बधन से मुक्ति दिला दे तो इस परिवार की भलाई हो सकती हैं। भगवानाराम 8 साल से अपने घर में बंधा हुआ है। कुछ साल पहले पिता भगवानाराम ने जोधपुर के मथूरादास माथुर अस्पताल में इलाज के लिये अपने पुत्र को लेकर गये थे। लेकिन रूपये खत्म होने पर अपने पुत्र को घर लेकर आ गये। पिता अपने पुत्र को छोड़ करके कही बाहर भी नही जा सकता है तो रस्सी से आजाद करके पुत्र को खुला भी नही छोड़ सकता है। सरकार की ओर से पांच सौ रूपए पेंशन शुरू की गई हैं लेकिन आर्थिक मदद व इलाज के लिए कोई आगे नहीं आता है।

इनका कहना हैं
मेरी अब ऐसी ऐसी हालत नही कि मै अपने पुत्र का इलाज करवा सकू। इसलिये थक हारके अपने दिल पर पत्थर रख के पुत्र को घर की चारदिवारी में बंद करके रखा है। खुला नही रख सकते है क्योकि इसकी मानसिक स्थिति सही नही है।
अमानाराम पिता।

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