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अखबार से अब पाठकों का पहले सा रिश्ता नहीं रहा-दिप सिंह दुदवा

रिपोर्टर @ मेहबूब राजड़ मुख्य मार्ग से दुर और छोटा गांव (दूदवा,जालोर)  होने की वजह से अभी तक डामरीकरण सडक से मेरा गांव नही जुड पाया था । पक्...

रिपोर्टर @ मेहबूब राजड़

मुख्य मार्ग से दुर और छोटा गांव (दूदवा,जालोर)  होने की वजह से अभी तक डामरीकरण सडक से मेरा गांव नही जुड पाया था । पक्की सडक नहीं होने की वजह से गांव में साधन बहुत ही कम समय-चौघडी आते थे, और गांव में भी साधन के नाम पर कुछ लोगो के पास ट्रैक्टर या एक-दो जीप हुआ करती थी । बस के नाम पर एक बस आती थी जो भीनमाल (जालोर) से सुबह आठ बजे रवाना होकर साढे ग्यारह बजे के करीब मेरे गांव पहुंचती थी । कच्चा रास्ता होने की वजह से बस में एक मजदूर पावडा के साथ हमेशा बस के साथ रहता था, न जाने कौनसे वक्त बस कच्चे रास्ते में फंस जाये । बस के फंसने पर मजदूर, बस ड्राइवर और कंडक्टर के साथ-साथ सवारीयां भी नीचे उतरकर टायर के नीचे से रेत हटाकर सिणीये डालकर बस को धक्का देकर बाहर निकालते थे । और इस तरिके से बस बाहर निकलती थी और आगे का सफर भी इस तरीके से पार होता था ।
बात करीब 1996-97 की है घर में दाता व पिताजी पढे लिखे थे सो अखबार की हमेशा कमी खलती थी । इसलिए देश-दुनियां, फसलों के भाव-ताव और समसामयिक खबरों से जुडे रहने के लिए 1996 में भीनमाल से उन दिनों का एक मुख्य अखबार  चालू करवाया । भीनमाल से हॉकर अखबार सुबह आठ बजे वहाँ से रवाना होने वाली बस मे चढा देता था और साढे ग्यारह बजे मेरे घर के पास से गुजरते वक्त कंडक्टर अखबार मेरे घर के पास फेक देता था।
और अखबार देखने पढने के लिऐ हमेशा चार-पांच चेहरे बस का इंतजार कीया करते थे । अखबार  हाथ मे आते ही चेहरे पर अजीब मुस्कान आती थी यूं लगता था जैसे बहुत बर्षो बाद कोई रिश्तेदार बस से उतरकर गले लिपट रहा हो। बडा शुकुन मिलता था ... अखबार के पहले पेज से लेकर अंतिम पेज का एक-एक अक्षर बडे ध्यान से पढते थे । लोगो के पास सयय था अखबार की खबरे पढने के लिए लोग दुर-दुर अपने खेतो से आते थे, फसलो के भाव से लेकर देश दुनियाभर की खबरो से अवगत होते थे । यूं कहे तो मात्र एक अखबार की प्रति  ने गांव के लोगो बीच एक अलग रिश्ता बना दिया था । 
हॉकर को हम अखबार के दुगुने दाम देते थे क्योंकि बस में चढाने की डेली की गारण्टी थी, लेकिन हमारे लिए एक अखबार का दाम तीन से चौगुना हो जाता था क्योंकि कई बार बस मे बैठे हुए यात्री अखबार पढने को ले लेते थे और वो लेकर ही बिच मे उतर जाते थे, या कई बार कंडक्टर और ड्राइवर नये-नये होने की वजह से अखबार डालने की जगह का ध्यान नही होने से आगे लेकर चले जाते थे। महिने मे दस-बारह दिन ही अखबार आता था फिर भी कोई गम नही था। 
हमे भी छोटी सी उम्र से अखबार पढने का चस्का लग गया था। जिस दिन अखबार हाथ नहीं लगता था अजीब-सी बैचैनी होती थी। अखबार पढने में दो-चार घंटे लगा देते थे क्योंकि पुरा का पुरा अखबार पढना एक आदत-सी हो गई थी। उस दौर में अखबार में विज्ञापन नाम मात्र के हुआ करते थे ।
समय बदलता गया 1999 में मेरा गांव डामर सडक से जुड गया  .. बसो के आवागमन की संख्या बढ गई ... एक बस की जगह सात-आठ बसे आने लगी । सडक बनने से अन्य साधनो की संख्या में भी भारी बढोतरी हुई । सप्ताह में दो-तीन बार आने वाला अखबार भी डेली आने लगा ... अखबारो की संख्या भी बढी एक से बढकर तीन-चार तरह के बीस-तीस अखबार आने लगे । हर घर गाडी,ट्रैक्टर और मोटरसाइकिल आम बात हो गई । गांव के लोग कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी का सफर तय करने लग गये। पुलिस की गाडी देखकर बबुल और खिंप की आड मे छिपने वाले लोग पुलिस से आंख से आंख मिलाकर बात करने लग गये ... बकरीयों की जगह घोडो ने ले ली ... आठ सौ से हजार में बिकने वाली बकरीयों की जगह 31लाख में बिकने वाले घोडो ने ले ली ... समय कदम बढा रहा हैं ... अगली बार 31लाख की जगह 41 लाख में घोडा बिक जाय तो कोई आश्चर्य की बात नहीं होगी .... समय की गति को कौन नियंत्रित कर सकता हैं।

अब आता हूं मेरी बात पर ....
बचपन से अखबार मुझ सहित हजारों लोगो की दिनचर्या का आम हिस्सा हैं .. हम जिस दिन अखबार नही पढ पाते उस दिन यूं महसूस होता है जैसे आज कुछ मिस किया हैं, लेकिन आज अखबार पढने वाले पाठको की इस प्रवृति का अखबार निकालने वाले घराने चाहे  टाइम्स आफ इंडिया हो या पंजाब केसरी  राजस्थान पत्रिका हो या भास्कर ... दैनिक नवज्योति हो राष्ट्रदुत या सभी अन्तर्राष्ट्रीय अखबार दोहन करते हैं । अखबारों मे आजकल समाचार कम और विज्ञापन ज्यादा होते हैं । कभी समय था जब समाचारों के बिच विज्ञापन हुआ करते थे लेकिन आजकल विज्ञापनो के बिच समाचार ढूंढने पडते हैं । पहले विज्ञापनो को अंतिम पेज पर स्थान दिया जाता था लेकिन आजकल पहले पेज से ही कभी-कभी तो लगातार चार पांच पेज विज्ञापन के ही दिखते हैं । आज पाठकों को मजबूरन ही न चाहते हुए भी विज्ञापनों पर नजर डालनी पडती हैं । हद तो तब होती हैं जब अखबारों को बेचने के लिए तरह तरह के ऑफर निकालने पड जाते हैं .. जो कभी खबरों के दम पर बिका करते थे और लोगो में अखबारों की विश्वसनीयता बनी रहती थी । आजकल विज्ञापनों के युग में अखबार अपनी विश्वसनीयता खोते जा रहे हैं .. लोगो की आस्था जो पहले अखबारों में हुआ करती थी अब दिन-प्रतिदिन घटती जा रही हैं । सोशल  मिडिया के जमाने में समय रहते अखबार घरानों ने समय रहते पाठकों की समस्या पर ध्यान नही दिया तो अखबारों की लोकप्रियता के साथ-साथ प्रिंटमिडिया पर भी खतरा मंडराता नजर आयेगा ।
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लेखक -
दीप सिंह दूदवा
( लेखक पंचायतीराज विभाग में कार्यरत हैं जो जागरूक पाठक के साथ-साथ विश्लेषक भी हैं, समय-समय पर इनके लेख विभिन्न पत्रिकाओं व समाचार पत्रों में प्रकाशित होते रहते हैं )

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