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जैन दर्शन का ठाठ परिग्रह का और पाठ अपरिग्रह को:आचार्य श्री

@ विपिन भंसाली आचार्यश्री का विहार शुक्रवार को आठ दिन तक बही पांडवों की तपोभूमि में धर्म की गंगा बाड़मेर/चौहटन, 12 जनवरी। तुफान के...

@ विपिन भंसाली

आचार्यश्री का विहार शुक्रवार को
आठ दिन तक बही पांडवों की तपोभूमि में धर्म की गंगा

बाड़मेर/चौहटन, 12 जनवरी। तुफान के समान तुम्हारी ताकत है तो वे विचार चक्षु का कारण बनता है तथा पवन के समान तुम्हारी ताकत है तो वे ताकत संघ समाज में सुगंध फैलाती है तो वे विवेक चक्षु है। पांच इन्द्रियां पशु के पास भी है तथा पांच इन्द्रिया मानव को भी मिलती है लेकिन इनको दोनों में भेद करने की शक्ति विवेक चक्षु में है जो मानव के पास ही हो सकते है। 
प्रखर प्रवचनकार मुनि सम्यकरत्नसागर ने स्थानीय जैन धर्मशाला में धर्मसभा को अंधों की आंखे खोली विषय पर संबोधित करते हुए कहा कि हिटलर ने हजारों यहुदियों का नरसंहार किया इसके पिछे वजह रही मात्र चर्म चक्षु और विचार चक्षु। अंधे के बेटे अंधे होते है ये चार शब्दों ने महाभारत का सर्जन कर दिया। अगर सही क्या है और गलत क्या है इसकी भूमिका आपके मन में जग गई है तो आपके विवेक चक्षु जागृत हो गये है। 
मुनि श्री ने न्याय और समाधान की परिभाषा समझाते हुए कहा कि न्याय एक घर में उजाला और दूसरे घर में अंधेरा करता है जबकि समाधान दोनों ही घरों में उजाला फैलाने का कार्य करता है। हमारी बेटी किसी के घर गई तथा ससुराल में सेट नहीं हो पाई तो हम कहते है कि उसके ससुराल वाले बुरे है अगर दूसरे किसी की बेटी हमारे घर में बहु बनकर आई तब हमें लगता है कि हमारी बहु बुरी है। जिस प्रकार पारा व पत्थर को पचाया नहीं जा सकता है वैसे ही पराये धन को पचाया नहीं जा सकता है।
मुनि श्री ने एक वाक्य देते हुए कहा कि जाने दो। जो मेरा है वो जा नहीं सकता, जो जा रहा है वो मेरा नहीं है। अगर इस वाक्य को कोई अपने जीवन में उतार ले तो वो व्यक्ति अपने जीवन में कभी भी दुःखी नहीं हो सकता है। मेरा है सो मेरा है, तेरा है सो तेरा है। हमारा जीवन चारों गतियों में जब तक रहेगा तो उसका कारण है विवेक चक्षु का अभाव। मुनि श्री ने कहा कि चमड़ें के साबुन और सौन्दर्य प्रसाधन की वस्तुएं लगाने से हमारी त्वचा सुन्दर होती तो ये वस्तुंएं अफ्रीका वालों को भी भेज दो वो भी सुन्दर हो जायेगें। मुनि श्री ने कहा कि व्यक्ति किसी भी सौन्दर्य प्रसाधन सुन्दर नहीं बनता है, सुन्दर बनता है तो मात्र नाम कर्म के उदय से।
मुनि श्री अंधे की आंखे खोली विषय के अन्तर्गत श्रद्धा चक्षु के बारे में बताते हुए कहा कि बुद्धि के क्षेत्र की जहां मर्यादा आती है वहां से श्रद्धा का जन्म होता है। जब तक श्रद्धा चक्षु की प्राप्ति नहीं होती है तब तक संसारिक परिस्थितियां हमारी मनःस्थिति को चलायमान करती रहती है। श्रद्धा चक्षु की प्राप्ति में तीन तत्व बाधक है, जिसमें पहला है अपार संपति का ध्येय रखना, दूसरा अधिक सफलता प्राप्त करने की चाह रखना एवं तीसरा तत्व है तीक्ष्ण बुद्धि। ये तीन तत्व मनुष्य के भीतर श्रद्धा चक्षु की प्राप्ति होने में हर समय बाधक बने रहते है। अगर श्रद्धा चक्षु की प्राप्ति करनी है तो इन तीनों तत्वों का त्याग करना होगा। अध्यात्म जगत की तमाम सफलताएं श्रद्धा पर निर्भर है। श्रद्धा अर्थात् नहीं दिखने वाली चीज को पाने के लिए दिखने वाली चीज को त्यागने की ताकत जिसमें है वो है श्रद्धा। परमात्मा, आत्मा, पुण्य इत्यादि ये तत्व नहीं दिखने वाले है एवं पद, पैसा, पत्नि, परिवार ये सब दिखने वाले तत्व है। इन नहीं दिखने वाले तत्वों के लिए दिखने वाले तत्वों का त्याग करना ही श्रद्धा है। ये श्रद्धा चक्षु ही हमारी आत्मा एवं परमात्मा से मिला सकते है। विवेक चक्षु एवं श्रद्धा चक्षु के अभाव में चर्म चक्षु एवं वचन चक्षु के अधीन रहने वाला मनुष्य अंधे की श्रेणी में ही आता है। संसार में जब तक हमारे साथ पुण्य तत्व नहीं है तब तक कितना भी पुरूषार्थ कर लो लेकिन कोई सफलता मिलने वाली नहीं है। परमात्मा को अगर अंतरहृदय में जन्म देना है तो कृपण हृदय एवं दारिद्र हृदय का त्याग करना जरूरी है। जैन दर्शन का ठाठ परिग्रह का है तथा जैन दर्शन का पाठ परिग्रह का है।

दादागुरूदेव की बड़ी पूजा का हुआ आयोजन
जैन श्रीसंघ चौहटन अध्यक्ष हीरालाल धारीवाल ने बताया कि दोपहर में जैन दादावाड़ी में परम पूज्य खरतरगच्छाचार्य जिनपीयूषसागरसूरीश्वर म.सा. के मुखारविन्द से विभिन्न रागों में दादा गुरूदेव की बड़ी पूजा पढ़ाई गई। पूजा में गुरू भक्ति में श्रद्धालुओं को मग्न करते हुए आचार्य श्री ने मेरे दोनों हाथों में ऐसी लकीर है, इस योग्य हम कहां है गुरूवर तुम्हे रिझायें, आदि भजनों के माध्यम से भाव विभोर कर दिया। 

आचार्यप्रवर का विहार शुक्रवार को
आचार्य प्रवर के 8 दिवसीय चौहटन प्रवास के पश्चात् शुक्रवार को प्रातः 6.30 बजे चौहटन नगर से विहार कर आलमसर, धनाऊ, भूणिया होते हुए 15 जनवरी को धोरीमन्ना पहुंचेगे जहां पर आचार्य भगवंत की निश्रा में 16 जनवरी को गणनायक सुखसागर महाराज की 131वीं पुण्यतिथि मनाई जायेगी। 17 से 21 जनवरी तक आचार्य भगवंत आर्य गुण गुरू कृपा तीर्थ रामजी का गोल में आयोजित प्रतिष्ठा महोत्सव में निश्रा प्रदान करेगें।  जैन श्रीसंघ अध्यक्ष हीरालाल ने आचार्य प्रवर के प्रवास को धर्म की गंगा बताई तथा प्रवास के दौरान संघ द्वारा किसी प्रकार का अविनय हुआ हो तो उसकी क्षमायाचना की। 

सामुहिक वर्षीतप आराधना की प्रेरणा
आचार्य प्रवर द्वारा चौहटन की धर्मप्रेमी जनता को आदिनाथ भगवान द्वारा किए गए वर्षीतप की आराधना को याद दिलाते हुए सामुहिक वर्षीतप की आराधना प्रेरणा दी। उक्त आराधना करवाने की बीड़ा विचक्षण स्नात्र मंडल द्वारा लिया गया। आराधना करने के लिए 50 के करीब आराधकों के नाम आ गये है तथा अभी भी आ रहे है।

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