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संसार ये असार है जीवन मनुुष्य का एक सफर:आचार्य श्री

@ विपिन भंसाली बाड़मेर/चौहटन, 7 जनवरी।  जहां अंधकार रहता है वहां प्रकाश नहीं रहता है। जहां प्रकाश है वहां अंधकार नहीं पहुंच सकता है। जह...

@ विपिन भंसाली

बाड़मेर/चौहटन, 7 जनवरी।  जहां अंधकार रहता है वहां प्रकाश नहीं रहता है। जहां प्रकाश है वहां अंधकार नहीं पहुंच सकता है। जहां ज्ञान है वहां अज्ञान नहीं रहता है। ज्ञान का स्वरूप प्रकाश की भांति है, अज्ञान का स्वरूप अंधकार की भांति है। सदियों की सदियों बीत गई और बीत जायेगी लेकिन कभी भी अंधकार प्रकाश के सामने नहीं पहुंच सकता है। दो तत्व कभी भी इस दूनिया में एक साथ रह सकते नहीं है। एक बार आपने मानव जीवन में जिनशासन में जन्म लेकर परमात्मा की दृष्टि से अपने भीतर में ज्ञान की एक किरण भी पहुंचा दी तो आपका अनादि अनंतकाल से रहा हुआ अज्ञान रूपी अंधकार दूर हुए बिना रह सकता नहीं है। 

प्रखर प्रवचनकार सम्यकरत्नसागर म.सा. ने स्थानीय जैन धर्मशाला में अंधों की आंखे खोली विषय पर धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि मानव जन्म को आपने हमने सबने प्राप्त किया, जिनशासन को प्राप्त किया उसका एकमात्र उद्देश्य था अज्ञान का अंधकार दूर करके भीतर में ज्ञान रूपी प्रकाश को प्रकट करे ताकि हमारे तमाम दुःखों का अंत आ जाये तथा जन्म मरण के चक्र का समूल नष्ट करना। 
मुनि श्री ने कहा कि अज्ञान से ज्ञान का प्रकाश प्राप्त करने का आलंबन है सद्गुरू। जो हमारा नजरिया, दृष्टिकोण, दोषों का बदल दे वे ही सच्चे सद्गुरू है। संसार को सही ढ़ंग से समझने के लिए जीवन में एकबार सद्गुरू की शरण में जाकर अपनी आंखों में ज्ञान का अंजन करवा लेवे। जो नहीं है उसे देखने वाला वास्तव में अंधा कहलाता है। 
मुनि श्री ने अंधे की परिभाषा बताते हुए कहा कि एक अंधा वो है जिसमें अपने सामने रही हुई वस्तु देखने की शक्ति नहीं है तथा अध्यात्म दृष्टि से अंधा वो है जो नहीं है उसे देखने की, प्राप्त करने की चाह रखता हो। पैसे में सुख नहीं है, पति में, पत्नि में, सता में, सम्पति में, सौन्दर्य में सुख नहीं है फिर भी उसमें सुख खोजते रहते है। जिनको भी इन सब में सुख नजर आता है वे वास्तव में अंधे है। देखने की शक्ति अगर आंख में होती तो मुर्दे के भी आंखे लगी होती है लेकिन वो नहीं देख सकता है। देखने की शक्ति आंख में नहीं होकर आत्मा में है। हमारे दादा गुरूदेव ने कितना महान कार्य किया संसार में जो नहीं है उन्हें जो खोज रहे थे उनकी आंखों का दादा गुरूदेव ने सम्यक दृष्टि प्रदान की। 
मुनि श्री ने कहा कि हमारे को हमेशा परमात्मा से तीन प्रार्थना करनी चाहिए है कि हे परमात्मा आंख मेरी दृष्टि तेरी, पैर मेरे शक्ति तेरी, ह्दय मेरा भक्ति तेरी। हे परमात्मा संसार का जो स्वरूप आपने अपनी दृष्टि से देखा है उसी दृष्टिकोण से मैं भी देख सकूं वो दृष्टि देना। संसार में जो नहीं है उसे हम देख रहे है उसी को देखना बंद करवाये वो ही सच्चा सद्गुरू है जो संसार को दिखाये, संसार की व्यवस्थाओं की पूर्ति हेतु ताबीज, यंत्र, मंत्र, रक्षापोटलियां दे वो कभी भी सच्चा गुरू नहीं हो सकता है। आज के पंचम काल में इस तरह के गुरू बहुत मिल जाते है। जब वीतराग परमात्मा संसार में सुखी नही कर सकते है तो संसार की कोई भी शक्ति तांत्रिक, मांत्रिक, भोपा, झाड़ा-फंूका करने वाले कोई भी ताकत हमें सुखी नहीं कर सकती है। सद्गुरू के तीन लक्षण बताते हुए कहा कि सद्गुरू सम्यक दृष्टि देते है। सम्यक दृष्टि देने के बाद आत्म शुद्धि करते है और आत्म शुद्धि के पश्चात् सिद्धि प्रदान करवाते है। 
मुनि श्री ने कहा कि व्यक्ति गंगा के पास बैठकर कुआ खोदकर प्यास बुझाने का जो प्रयास कर रहा है उसे मुर्ख और नादान ही कहा जायेगा। हमें जिनशासन मिलने के बाद भी हम संसारिक सुख प्राप्ति के लिए इधर-उधर भटक रहे है, ये मुखर्ता है, अज्ञानता है। जो भी व्यक्ति चाहे वो संत भी क्यों न हो वीतराग शासन में रहकर वीतराग भगवान की आज्ञा के विरूद्ध कोई कार्य करता है तो उसे वीतराग के शासन में रहने का कोई अधिकार नहीं है। कुगुरू पत्थर की नाव के समान है। जिस प्रकार पत्थर की नाव कभी पानी में तैर नहीं सकती है उसी प्रकार कुगुरू हमारे को कभी भी इस भवसागर से पार नहीं कर सकते है। वे स्वयं भी डूबेंगे और हमें भी डूबायेंगें। संसार एकान्त दुःखमय है, इसमें लैसमात्र का भी सुख नहीं है। औचित्य धर्म में कहा गया है कि सच्चे माता-पिता वही है जो अपनी संतान के बौद्धिक विकास प्राप्त होने के बाद सबसे पहले जिनशासन का मार्ग दिखाये। 
मुनि श्री ने कहा कि व्यक्ति पहले पैसा कमाने में अपना शरीर बिगाड़ता है फिर शरीर सुधारने के लिए पैसे बिगाड़ता है। जिनशासन कहता है जिनशासन में जन्म लेने वाले बालक-बालिकाएं माता-पिता की धरोहर नहीं है वो तो जिनशासन की धरोहर है उसे जिनशासन में ही समर्पित किया जाना चाहिए। 
जैन श्रीसंघ चैहटन अध्यक्ष हीरालाल धारीवाल ने बताया कि शनिवार को दोपहर में शांतिनाथ पंचकल्याणक पूजा परम पूज्य खरतरगच्छाचार्य जिनपीयूषसागर सूरीश्वर म.सा. की निश्रा में आयोजित की गई। रविवार को प्रातः 9.30 बजे परम पूज्य खरतरगच्छाधिपति वीरपुत्र आनन्दसागर सूरीश्वर म.सा. की 56वीं पूण्यतिथि के निमित गुणानुवाद सभा एवं दोपहर में 3 से 4 सामुहिक सामायिक का आयोजन किया गया है।

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