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दलित उत्पीडन रोकने की नाकामिया......

@ मेहबूब राजड़ भारत में अनुसूचित जाति और जनजाति उत्पीड़न को लेकर आयी रिपोर्ट ने देश में शासन व्यवस्था की नाकामियों को उजागर करने की श्रे...

@ मेहबूब राजड़

भारत में अनुसूचित जाति और जनजाति उत्पीड़न को लेकर आयी रिपोर्ट ने देश में शासन व्यवस्था की नाकामियों को उजागर करने की श्रेणी को एक नया बल दिया हैं और मानवीय हिंसा की इस दलित उत्पीड़न रिपोर्ट में इसका जिक्र हुआ हैं। सोमवार को जारी सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय की एक रिपोर्ट में इनका खुलासा हुआ हैं, जिसमे राजस्थान इस मामले 23,861 केस लेकर प्रथम स्थान पर रहा हैं। देश को आजादी मिली आज 75 वर्ष से उपर हो गये हैं लेकिन दलितों और शोषितों पर होने वाले अत्याचारों में कोई कमी आई हैं ना ही वे पूर्ण रूप से आजाद हुए हैं। आज देश के हर कौने में दिनों –दिन ऐसी घटनाएँ हमारे सामने देखने को मिलती हैं। दलितों के सरंक्षण हेतु बनाये गये कानूनों का क्रियान्वयन भी पूरी तरह से नही हो पाता हैं जिसमे राजनैतिक हस्तक्षेप के कारण इनको न्याय भी नही मिल पाता हैं। दूसरी और केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा बनाये गये आयोगों तथा अन्य संस्थाओं की कार्यशैली भी बदतर होना भी भारतीय राजव्यवस्थापर सवालिया निशान हैं।
हमने दलितों को सरंक्षण देने के नाम पर अनेक कानून और संस्थाओं का निर्माण किया। लेकिन एक उचित एजेंडों तथा समन्वयकारी भाव की कमी के कारण इनको दिशा दे नही पाए हैं हैं। देश की किसी भी सरकारों ने इसकी उचित सुध भी नही ली हैं। कई-न-कई यह हमारी सरकारों की कमी से ही तो हो रहा हैं, रिपोर्ट आने के पश्चात सत्ता पक्ष और विपक्ष अब इस पर बहस करने के अलावा कुछ नही कर पायेगा ,बहस होने के पश्चात यह मामला ज्यों का त्यों रह जाएगा। अनुसूचित जाति और जनजाति के वर्गो के लोगो में जागरूकता लाने तथा निशुल्क विधिक सहायता देने जैसे कार्यों से ही दलित उत्पीड़नों को रोका जा सकता हैं। लोगो की मानसिकता में बदलाव लाकर देश में बढ़ रही दलित हिंसा को रोका जा सकता हैं।
एक ओर बात में ध्यान आयी की जहाँ निम्न साक्षरता दर हैं वहां इनका औसत अधिक हैं जहा सामाजिक रूढियों और कुरीतियों का जन्म हो जाता हैं, जिसकी वजह से आज भी दलित वर्ग को हीन भावना से देखा जाता हैं जो साक्षर भारत और भारत की सामाजिक न्याय की भावना संदेहास्पद भावना को पुर्नजीवित करता हैं। संविधान की प्रस्तावना में जो हमारे संविधान निर्मातों ने सामाजिक न्याय की हमे परिभाषा दी हैं उसकी सार्थकता पर संदेह होना स्वाभाविक हो गया हैं। आज भी जहा दलित बहुसंख्यक इलाके हैं वहां शिक्षा की कमी हैं  वहा साक्षरता बढाने के विशेष कार्यक्रम चलाने होंगे जिससे दलित वर्ग में जागरूकता आएगी। 1989 के अनुसूचित जाति और जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम में में एक विशेष बदलाव कर भावना संदेहास्पद भावना को पुर्नजीवित करता हैं। संविधान की प्रस्तावना में जो हमारे संविधान निर्मातों ने सामाजिक न्याय की हमे परिभाषा दी हैं, उसकी सार्थकता पर संदेह होना स्वाभाविक हो गया हैं। आज भी जहा दलित बहुसंख्यक इलाके हैं वहां शिक्षा की कमी हैं, वहा साक्षरता बढाने के विशेष कार्यक्रम चलाने होंगे जिससे दलित वर्ग में जागरूकता आएगी। 1989 के अनुसूचित जाति और जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम में में एक विशेष बदलाव कर इसको राष्ट्रीय से लेकर स्थानीय स्तर तक जहा आमजन को भागीदारी को साथ लेकर सफल क्रियान्वयन की जरूरत हैं ना कि इस पर असार्थक राजनीति बहस की।

-शौकत अली खान, तेजा की बेरी
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