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दोषों से मुक्त होने से ही महामांगलिक की सार्थकता:पीयूषसागरसूरि

गोलच्छा ग्राउंड में हजारों की जनभेदनी से सुनी महामांगलिक  आचार्य श्री का कल होगा नगर से प्रस्थान बाड़मेर, 1 जनवरी। नववर्ष की मंगलमय न...

गोलच्छा ग्राउंड में हजारों की जनभेदनी से सुनी महामांगलिक 
आचार्य श्री का कल होगा नगर से प्रस्थान
बाड़मेर, 1 जनवरी। नववर्ष की मंगलमय नवप्रभात पर गोलेच्छा-डूंगरवाल ग्राउंड में शासन प्रभावक आचार्य जिनपीयूषसागर सूरीश्वर म.सा. की मुखारविंद से सभा में हजारों की संख्या में उपस्थित जनभेदनी को महामांगलिक प्रदान की गई। आचार्य श्री ने कहा कि आपके नव वर्ष का हर एक महिना, हर महिने का हर एक दिन, हर दिन का हर एक घंटा, प्रत्येक घंटे का प्रत्येक पल में अपनी आत्मा को दोषों से मुक्त करने का प्रयास व पुरूषार्थ करना आवश्यक है। जब तक परमात्मा के वचनों को सच्चे मन से एवं सच्ची श्रद्धा के साथ अपने ह्दय में नहीं उतारते है तब तक महामांगलिक सुनना सार्थक नहीं है। अगर हमें महामांगलिक सुनने का सार्थकता बनानी है तो जिनेश्वर परमात्मा के सच्चे वचनों एवं उनकी जिनवाणी पर सच्ची श्रद्धा होना अति आवश्यक है।

प्रवचन सभा को संबोधित करते हुए प्रखर प्रवचनकार मुनि सम्यकरत्न सागर म.सा. ने जब तक मनःस्थिति बदलेगी नहीं, परमात्मा के शासन के प्रति सच्ची श्रद्धा नहीं होगी तब तक उसकी वस्तुस्थिति नहीं बदल सकती है। वास्तु शास्त्र से कोई आज दिन तक सुखी हुआ नहीं है। अगर वास्तु शास्त्र से सुख मिलता, पिरामिड रखने, लाफिंग बुद्धा रखने से सुख, शांति प्राप्त होती तो शायद तीर्थंकर परमात्मा ने अपने जीवन में बहुत बड़ी भूल की जो घर बार छोड़कर, वास्तु छोड़कर सुख के लिए, शांति के लिए, आत्मा की क्रांति के लिए जंगलों में जाकर साधना की। आज मर्यादा पुरूषोतम श्रीराम का नाम गर्व के साथ लिया जाता है क्योंकि उन्होनें शांति प्राप्त करने के लिए जंगलों में विचरण किया। वस्तुपाल-तेजपाल, कुमारपाल, भीमा कुंडलिया, जैसलमेर के पटवों ने भी अपनों वंश चलाने के लिए शादी की लेकिन उनका वंश नहीं चल पाया। वंश धृतराष्ट्र का 100 कौरवों होने के बावजूद भी नहीं चल पाया। सुखों की तलाश में दुःखों की प्राप्ति कर लेते है। मात्र सुखों की चाह में आदमी दुःखों की गठरी बांधता जा रहा है। आदमी संसार के मोह-मायाजाल में कदम दर कदम फंसता जा रहा है फिर भी वह सुख की लालसा, चाह, कामना को नहीं छोड़ रहा है, मगर वह दुःखों के दल-दल में ही फंसता जा रहा है। वही व्यक्ति सुखों के लिए नाना प्रकार के जतन करता है, शरीर पर सुखों के लिए अलग-अलग प्रकार के हीरे, माणक, मोती जैसे पत्थरों को धारण करता है। धर्म के नाम पर दिखावा कर हम स्वयं के क्षणिक लाभ के लिए अधर्म करते जा रहे है। अहिंसा का नारा लगाते हुए हम पल-पल हिंसा करते जा रहे है। हम धर्म से ही नहीं कर्म से भी भगवान महावीर के अनुयायी बने, सच्चे जैन बने। गलत मान्यताओं के सहारे जीवदया, जीव कल्याण के ढकोसले करने की जरूरत नहीं है। हमें निस्पृह भाव से सेवा करने की जरूरत है। संसार में सुख-शांति की प्राप्ति व्यक्ति के पुरूषार्थ से ही सम्भव है। बिना पुरूषार्थ के इस संसार में कोई किसी को कुछ भी नहीं दिला सकता है। भगवान स्वयं मनुष्य को पुरूषार्थ के पथ पर चलने का ज्ञान देते है। संसार में सद्कर्माें के बल पर ही सिद्धियों की प्राप्ति हुई है।
मुनि श्री ने कहा कि अपने आपको सच्चा जैनी कहने वाला, पर्युषण में अहिंसा का पालन करने वाला, जमीकंद नहीं खाने वाला व्यक्ति वनस्पति के जीव नीम्बू मीर्च बांधकर, उन वनस्पति के जीवों को पीड़ा पहुंचाकर अपने दुकान में मंगल की कामना करता है तो वो कभी जीवों को दुःखी करके सुख प्राप्त नहीं कर सकता है। ज्योतिष शास्त्र व वास्तु शास्त्र से तुम्हारा कोई मंगल-अमंगल होने वाला नहीं है। भारत में पांच लाख ज्योतिष शास्त्री है उन्होनें मिलकर ये घोषणा क्यों नहीं की कि मोदी सरकार 500-1000 का नोट बंद करने वाली है। कैसी-कैसी नासमझी, कैसी-कैसी नादानी जिस सांप ने अपने अतिरिक्त शरीर की कांचली कलेवर को छोड़ दिया होगा, जिस सांप ने उस सांप की कांचली में रहकर रेंग-रेंगकर पुरी जिन्दगी दुःख पाये, शरीर लहुलुहान हुआ है और हमारी बुद्धि कहती है कि वो सांप का शरीर हमें सुखी करेगा। ऐसे जितने भी चोंचके है, गंदीवाड़ा है वो सब आज नववर्ष के दिन घर जाने के बाद बाहर निकाल देना। एकमुखी, दोमुखी, पंचमुखी रूद्राक्ष पहनकर अपने सुख की कामना करने वाले ये रूद्राक्ष कुछ भी नहीं है जैसे पपीता, आम, अमरूद है वैसे ही रूद्राक्ष वनस्पति है। नव वर्ष पर मुनि श्री ने तीन संकल्प दिलवाये-प्रभु आंखे मेरी, दृष्टि तेरी, पैर मेरे, शक्ति तेरी, ह्दय मेरा, भक्ति तेरी।
विशेष डाक आवरण का हुआ विमोचन 
महोपाध्याय क्षमाकल्याण महाराज के महाप्रयाण द्विशताब्दी वर्ष के उपलक्ष में ललितकुमार नाहटा के प्रयास से भारत डाक विभाग द्वारा जारी विशेष आवरण का विमोचन नैनमल भंसाली, रीखबदास मालू, शंकरलाल पड़ाईया, सोहनलाल गोलेच्छा, ओमप्रकाश भंसाली द्वारा किया गया।
आचार्यश्री का वासक्षेप लेने उमड़े श्रद्धालु नववर्ष की प्रथम पावन वेला पर महामांगलिक पश्चात् बाड़मेर नगर की धर्मप्रेमी जनता आचार्य श्री का सूरिमंत्र से अभिमंत्रित वासक्षेप लेने के लिए आचार्य श्री के चरणों में पहुचे एवं उनके करकमलों से अपने मस्तक पर मंत्रित वासक्षेप ग्रहण किया। 
चातुर्मास समिति ने किया आचार्य श्री का गुरूपूजन
खरतरगच्छ संघ चातुर्मास समिति के अध्यक्ष रतनलाल संखलेचा ने बताया कि चातुर्मास समिति द्वारा परम पूज्य खरतरगच्छाचार्य जिनपीयूषसागरसूरीश्वर म.सा. के चरणों में गुरूपूजन किया एवं उनके संघ की ओर से कांबली ओढ़ाना चाहा लेकिन आचार्य भगवंत ने अपनी मर्यादा के अनुसार जैन साधु आवश्यकता से अधिक कोई वस्तु ग्रहण नहीं करता है उसी अपरिग्रह महाव्रत को ध्यान में रखकर संघ की भावना को सम्मान देते हुए कहा कि जब भी काम्बली आवश्यकता होगी तब ग्रहण करेगें। 

 संखलेचा ने सम्पूर्ण चातुर्मास समिति की ओर से सभी का आभार व्यक्त किया एवं आचार्य भगवंत के बाड़मेर प्रवास यादगार रहा तथा उनके प्रवास के दौरान चातुर्मास समिति की ओर से किसी प्रकार का अविनय अथवा त्रुटि की क्षमायाचना की।
इस अवसर पर महासमुंद छतीसगढ़ से पधारे रजत चौपड़ा, कमलाबेन बड़ेर, शोभा गुलेच्छा चैन्नई, प्रतिभा कोठारी चैन्नई का अभिनन्दन किया गया।
आचार्यश्री का कुशल वाटिका की ओर होगा विहार
बाड़मेर नगर में 27 दिसम्बर से 1 जनवरी तक प्रवास करते हुए जिनशासन की पताका फहराने के पश्चात् 2 जनवरी को प्रातः 9 बजे सकल संघ के साथ कुशल वाटिका की ओर प्रस्थान करेगें। आचार्य भगवंत का 5 जनवरी को प्रातः 9 बजे पांडवों की तपोभूमि चौहटन नगर में मंगल प्रवेश होगा।

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