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चैत्र नवरात्र 28 से, प्रतिपदा में 1 मिनट तक अमावस्या

गणेश जैन हर वर्ष चैत्र नवरात्र की घट स्थापना अमावस्यायुक्त प्रतिपदा में होगी। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार हमारे यहां उदियात तिथि मानी जा...

गणेश जैन

हर वर्ष चैत्र नवरात्र की घट स्थापना अमावस्यायुक्त प्रतिपदा में होगी। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार हमारे यहां उदियात तिथि मानी जाती हैं। चैत्र माह और नवसंवत्सर विक्रम संवत 2074 का आरंभ 28 मार्च मंगलवार को सुबह 8:28 मिनट पर होगा जबकि 8:27 मिनट तक अमावस्या रहेगी।

सूर्य उदय के समय अमावस्या रहने से अमावस्यायुक्त प्रतिपदा में स्थापना होगी। इससे पूर्व लगभग 16 साल पहले 25 मार्च 2001 को भी अमावस्यायुक्त प्रतिपदा में घट स्थापना थी। तब सूर्योदय 6:26 बजे के बाद 6:52 तक अमावस्या थी। प्रतिपदा तिथि 28 मार्च को सुबह 8:28 से 29 मार्च सुबह 5:45 बजे तक रहेगी। सूर्योदय के समय द्वितीया तिथि जाएगी। क्योंकि सूर्योदय के समय प्रतिपदा नहीं होगी,इसलिए इस नवरात्र में प्रतिपदा तिथि का क्षय हो गया है। ऐसे में 28 मार्च को ही नवसंवत्सर की शुरुआत और नवरात्र घट स्थापना अमावस्यायुक्त प्रतिपदा में ही करना शास्त्रों के अनुसार माना जाएगा। शास्त्रों के अनुसार स्थापना और आरोपन आदि कर्म के लिए सुबह का समय श्रेष्ठ माना गया है। सूर्योदय से 10 घडी यानी लगभग 4 घंटे के समय को सर्वश्रेष्ठ माना गया है। नवसंवत्सर-2074 का प्रवेश 28 मार्च सुबह 8:28 मिनट पर मेष लग्न में होगा। नए साल का पहला सूर्योदय दूसरे दिन 29 मार्च को होगा। इस संवत का नाम साधारण रहेगा। इससे पूजन आदि में संकल्प साधारण नाम से ही लिए जाएंगे।
स्थापना बुधवार को श्रेयस्कर
पं.सुरेंद्रकुमार श्रीमाली के अनुसार चैत्र माह की प्रतिपदा क्षय अमावस्या युक्त है। इनके अनुसार देवी पुराण में स्पष्ट लिखा है कि चंडिका पूजन में अमावस्या से युक्त प्रतिपदा ग्रहण नहीं करनी चाहिए। द्वितीया आदि के गुणों से युक्त मुहूर्त मात्र प्रतिपदा भी हो तो वही लेनी चाहिए। इस तथ्य के अनुसार इस साल नवरात्रा स्थापना द्वितीया बुधवार को श्रेयस्कर रहेगा। श्रीमाली के अनुसार गीताप्रेस गोरखपुर के पंचाग में भी बुधवार से नवरात्रा प्रारंभ बताई गई है।
मंगल होंगे राजा
इस साल के राजा मंगल होंगे। देवगुरु मंत्री का पद संभालेंगे। साथ ही इस साल बुधदेव तीन पदों की गद्दी ग्रहण करेंगे, जबकि सस्येश यानी खरीफ की फसल के स्वामी सूर्यदेव होंगे। धानेश यानी रबी की फसल के स्वामी शुक्रदेव होंगे। बुधदेव मेघेश फलेश का पद तो ग्रहण करेंगे ही, सेनापति का कार्यभार भी बुधदेव ही संभालेंगे।

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