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मालवाड़ा में होली का त्यौहार शांतिपुर्वक मनाया

@ प्रकाश राठौड़ जालोर/मालवाडा। नगर में होली के शुभ अवसर पर रविवार के दिन होली चौक पर शाम के समय शुभ मुहर्त पर विधि विधान के साथ होली का...

@ प्रकाश राठौड़

जालोर/मालवाडा। नगर में होली के शुभ अवसर पर रविवार के दिन होली चौक पर शाम के समय शुभ मुहर्त पर विधि विधान के साथ होली का दहन किया गया व आस पास के गांवो में भी हर्सोल्लास के साथ होली का पर्व शान्तिपुर्वक मनाया गया व दुसरे दिन घुलेडी में भी लोगो ने शान्तिपुर्वक गैर खैल कर एक दुसरे पर होली के रंगो को उडाकर मनाया गया। घुलेडी के दिन सवैरे सवैर छोटे छोटे बच्चे को गौरीयो द्वारा घुंडाला गया और महिलाओ ने होली के गीत भी मारवाडी में  गाये जैसें- एक बार जीजा आवेतो थरी सालीया जोवे वाट..................., पालीसु लखारो आयो..................,हारे हीडो हालो रे में थे थारे सालीलागु रे..................हमके पीवर मेलोनी मने थै................,  होलीचैक पर गैर भी शान्तिपुर्वक खेली गई।
पुराणो मे भी मान्यता है।
इस पर्व को मनाने के बारे में पुराणो में मान्यता है कि इस दिन राजा हिरण्यकश्यप ने अपने पुत्र पेहलाद जो भगवान विष्णु का भक्त था। और उस जमाने में राजा हिरणकश्यप ही अपने आप को भगवान मान रहा था। परन्तु उसका पुत्र पेहलाद उसे भगवान नही मान रहा था। हिरण्यकश्यप के बार बार कहने पर भी वो भगवान विष्णु को ही भगवान मान रहा था। तब हिरण्यकश्यप ने अपनी बहिन होलिका जिसे ब्रहृमाजी का वरदान था कि अग्नि उसका कुछ नही बिगाड सकती थी। तब पेहलाद को मारने के लिए उसकी बहिन होलिका को उतेजित करके पेहलाद को अपनी गोद में बैठा कर उसके चारो ओर अग्नि लगा दी तब भगवान का भक्त पेहलाद बच गया ओर होलिका जल कर भष्म हो गई। इस दिन से ही सभी लोग होलिका का पर्व मनाते है और दुसरे दिन लोग रंगबिरगे रंगो को एक दुसरे पर डालकर खुश होते है। 
दुसरे दिन रंगो के साथ रही गैर की धुम
नगर में व आस-पास के गावो में भी होली के दुसरे दिन ढुढोत्सव की धुम रही। परम्परा के अनुसार इस दौरान ग्रामवासीयो सहित गैरिये जहा जहा पर ढुढ होती है वहा पर बालको को गैरियो द्वारा ढुंढारते है। परिवार में जन्में बालक को ढुंढोत्सव के बाद होलिका स्थल पर फेरे दिये जाते है। यह कार्यक्रम शादी की तरह होता है। यहा के लोग इसे बालक की शादी का नाम देते है और ढुंढवाले बालको को भी घर वाले नन्ना दुल्हा बना देते है, ढंुढोत्सव का कार्यक्रम जिस घर होता है उस घर को रोशनीयो सेे सजाया जाता है व दो चार दिन पर्व महिलाए अपने घरो में मंगल गीत गाती है। नन्ने बालक के ननिहाल पक्ष से पुरे परिवार के लिए नये कपडे व अन्य सामग्री भेट की जाती है। ढुढ वाले बालक को मामा अपनी गोद में उठाकर होलिका केे चारो ओर फेरे लिए जाते है। शाम के समय होलीचैक पर ग्रामीणो द्वारा गैर खेली जाती है। ग्रामीणो ने भी बढचढ कर भाग लिया जबरसिह देवल, विनोद जानी, भुरसिह राठौड, शान्तिलाल श्रीमाली, लक्ष्मण सैन, सुरेश लुहार, कालुसिह काबा, मदनसिह देवल, प्रकाश मेघवाल, वसन्त सोनी, घुनाराम राणा, भंवर घांसी, नरपतसिह राठौड, राणसिह देवल, चन्दनसिह देवल, अर्जुनसिह देवडा, जोगेन्द्रसिह, अर्जुन माली, लक्ष्मण गुलशन, भरत जीनगर, नरपत वाघेला, रणजीतसिह, नरपतसिह पानीवाल, देवीसिह सोलकी, मनोहरसिह रावत, रमेशभाटी सैन, नरेश गर्ग, कलपेश श्रीमाली, विनोद लखारा, जबराराम सैन, चम्पालाल मोदी, नारण हिरागर, सहित समस्त ग्रामवासी मौजुद थै एवं शांति व्यवस्था बनाये रखने के लिए मालवाडा चैकी से चैकी प्रभारी विरेन्द्रसिह नरूका के नेतृत्व में मंुशी संग्रामाराम विश्नोई, मानवेन्द्रसिह, प्रेमसिह का भी विशेष सहयोग रहा। मालवाडा नगर में होली का त्यौहार शांन्तिपर्वक रहा। यह पर्व एकता का पर्व, अधर्म पर धर्म का पर्व है। अंहकार व अन्य बुराईयो को भष्म करते अच्छाईयो की विजय तथा द्वेश भाव भुलाकर सबसे प्रेम से मिलना चाहिए।

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