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म्हारी सवा लाख री लूंब, गुम गई ईंडाणी, लुफ्त होती ईंडाणी

रिपोर्टर @ प्रकाश राठौड  जालोर/मालवाडा। म्हारी सवा लाख री लूंब, गुम गई ईंडाणी यह पंक्ति राजस्थानी लोकगीत की अब मात्र गुनगुनाने तक सीमि...

रिपोर्टर @ प्रकाश राठौड 

जालोर/मालवाडा। म्हारी सवा लाख री लूंब, गुम गई ईंडाणी यह पंक्ति राजस्थानी लोकगीत की अब मात्र गुनगुनाने तक सीमित रह गई है। कभी पणिहारी के सिर शोभित होने वाला मुकुट ईंडाणी अब बीते जमाने की बात हो गई है।
आज कल की युवतिंया को ईंडाणी की जानकारी ही नही है, क्योंकि आज न पनघट रहे न पणिहारी तो फिर ईंडाणी किस काम की। विज्ञान के युग में घर-घर ना एवं हैण्डपंप लगे होने के कारण घर से बाहर कोई पानी भरने जाता ही नही। जिस जमाने मे ईंडाणी का प्रचलन था उस समय बेटी की दहेज मे भी ईंडाणी अवश्य दी जाती थी। राजस्थान के मारवाड़ अंचल में पानी से भरे घड़े को सिर पर उठाने के लिए ईंडाणी अच्छा उपकरण हुआ करती थी। ईंडाणी मुंज की बनाकर रंगीने कपड़े की रिबिन से गुंथ कर मोतियों से जड़कर उसकी सुंरदता के लिए कांच के टुकड़े व मणियो की झालरी बनाई जाकर चोटी की दिशा मे तीन लम्बी-लम्बी लुम्ब लगाई जाती थी। ईंडाणी राजस्थानी लोक कला व ग्रामीण जनजीवन का आईना हुआ करती थी। पनघट पर जब पांच-सात पणिहारियां मिलती थी तब एक-दूसरे की ईंडाणी अवश्य देखा करती थी।

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