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यहाँ के लोगों को आज भी पीने के पानी को ताले में रखना पड़ता हैं।

यहाँ के लोगों को आज भी पीने के पानी को ताले में रखना पड़ता हैं। विपिन भंसाली चौहटन से बाड़मेर जिले के पश्चिमी शरहद जितनी दुश्मन...

यहाँ के लोगों को आज भी पीने के पानी को ताले में रखना पड़ता हैं।

विपिन भंसाली चौहटन से
बाड़मेर जिले के पश्चिमी शरहद जितनी दुश्मनों से खतरनाक मानी जाती हैं उससे भी कही ज्यादा बदन की अग्नि मिटाने के लिए खतरनाक साबित होती दिखती हैं। जी हां हम बात कर रहे हैं पश्चिमी राजस्थान के बॉर्डर से सटे क्षेत्र में पीने के पानी को लेकर लोगों की जिंदगी के जंग की, क्योंकि आजादी के बाद से पानी के लिहाज से हरदम मोहताज रहने वाले सरहदी इलाके के लोगों पीने के पानी की प्यास आज आजादी के  सत्तर साल बाद भी मोहताजी कम नहीं हुई है। इस इलाके के लोगों को पानी की एक एक बूंद सहेजकर रखनी पड़ती है वहीं पानी की चौकसी के लिए घी की तरह जतन करने पड़ते हैं। चौहटन उपखंड के सरहदी रमजान की गफन, आरबी की गफन, भोजारिया, केलनोर, शोभाला, नवापुरा, रानातली, बीजराड़, उदसियार सहित सरहद से सटे दर्जनों गांवों के लोग जहां बरसाती पानी को टांकों में सहेजकर रखते हैं, वहीं इन टांको और टांकलियों में संग्रहित पानी की हिफाजत के लिए उन पर ताले लगाकर पानी की पहरेदारी की जाती है। इन गांवों में भूगर्भ का पानी खारा होने तथा दूरदराज तक रेतीले धोरों के बीच पसरे गांवों में जलदाय विभाग की कोई स्कीम सक्सेज नहीं हो पाई है। बरसात के दौरान ग्रामीणों द्वारा बरसाती पानी संग्रहित कर अपने हलक तर करने पड़ते हैं, वहीं गर्मी के दिनों में महंगी दरों पर टैंकरों का पानी खरीद कर अपनी प्यास बुझानी पड़ रही है। इस क्षेत्र के लोगों को घी, तेल जैसे महंगे तरल पदार्थों की तरह कीमती पानी पर भी पहरेदारी करने की मजबूरी आज भी बनी हुई है, लोग अपने टांको और टांकलियों पर ताले जड़कर रखना यहां की परंपरा सी बन गई है। अब देखने वाली बात यह हैं कि इस डिजिटल युग मे भारत सरकार इस क्षेत्र में पानी कब तक मुहैया कराने में सफल होती हैं।

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