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बाड़मेर में जैन समाज के नवनिर्मित मंदिर में गादीनशीन हुए गौड़ी पार्श्वनाथ।

बाड़मेर में जैन समाज के नवनिर्मित मंदिर में गादीनशीन हुए गौड़ी पार्श्वनाथ। बाड़मेर। प्रतिष्ठा महोत्सव समिति के संयोजक रतनलाल बोहरा...

बाड़मेर में जैन समाज के नवनिर्मित मंदिर में गादीनशीन हुए गौड़ी पार्श्वनाथ।

बाड़मेर। प्रतिष्ठा महोत्सव समिति के संयोजक रतनलाल बोहरा हालावाला ने बताया कि नव दशक का आगाज स्वर्णिम रहा 2020 के आगाज के साथ ही  26 फरवरी का दिन सुनहरे इतिहास का सुवर्णमय पृष्ठ में दर्ज हो गया। जैन धर्म के 23 वें तीर्थकर गौड़ी पार्श्वनाथ भगवान तीन लोक के नाथ गादीनशीन होते है, प्रतिष्ठित होते है, सामान्य घटना नहीं होती है। प्रतिष्ठा तो अनेक प्रकार से अभ्युदयकारी होती है। जितने - जितने ऊंचे - ऊंचे महान पवित्रतम भावों से प्रतिष्ठा होती है, उतना - उतना अभ्युदय बढ़ता रहता है। जिनालय के बाहर मानव सैलाब उमड़ रहा था। उन सभी को बहुत बड़ा एक आश्वासन था कि जिस अमर ध्वजा की बोली हुई है, उस लहराती ध्वजा को तो हम जरूर देखे। अब तो प्रतिष्ठा की शुभ घड़ी समीप आ रही थी। जिनालय में आवाज गूंजी - गच्छाधिपति सावधान, विधिकारक सावधान, प्रतिष्ठाकारक सावधान, थाली बजाने वाले सावधान, ध्वजा वाले सावधान और सब अपने - अपने स्थान पर पहुंच गये। ओम पुण्याहं - पुण्याहं, प्रियन्तां - प्रियन्तां के पवित्र स्वर गूंज उठे। आचार्य भगवंत, मुनि भगवंत, साध्वी भगवंत भी प्रभु के पास आ खड़े थे। प्रतिष्ठा की मंगल शुभ घड़ी के कुछ क्षण बाकी थे ओर आचार्य भगवंत के मुखारविंद से मंत्रोच्चार के स्वर गूंजे - ‘‘भौ कूर्मः निज पृष्ठे जिनबिम्बं धारय - धारय’’ श्वास स्तंभन हुआ ओर जिस शुभ घड़ी, शुभ क्षण का इंतजार था, वो क्षण आ गये। ओम पुण्याहाम् - पुण्याहाम्, प्रियंताम - प्रियंताम के मंत्रोचार के साथ गगनभेदी जयकारों के चलते बाड़मेर नगर में बहु प्रतिक्षित प्रतिष्ठा महोत्सव में बिराजित होने वाले प्रभु गौड़ी पार्श्वनाथ भगवान सहित समस्त जिनबिम्बों, देव - देवियों की प्रतिष्ठा करते हुए, गौड़ी पार्श्वनाथ व शंखेश्वर पार्श्वनाथ परमात्मा, दादा गुरूदेव सहित अन्य देवी - देवताओं को गादी गादीनशीन किया गया, जिसमें मूलनायक भगवान को प्यारीदेवी मांगीलाल गोलेच्छा हालावाल परिवार द्वारा विराजमान किया गया। गौड़ी पार्श्वनाथ के शिखर पर गौदावरी देवी व्यापारीलाल बोहरा हालावाला परिवार की ओर से कायमी ध्वजा चढाई गई। इसी तरह दादागुरूदेव कि ध्वजा लुणीदेवी नेमीचन्द संखलेचा सियाणी वालो कि ओर से चढाई गई।

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