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720वीं सैन जयंती विशेष: आदर्श युग निर्माता देश में सेन समाज की अलग पहचान।

720वीं सैन जयंती विशेष: आदर्श युग निर्माता देश में सेन समाज की अलग पहचान। @रामसेवक चौहान एम.कॉम.,एम.ए.,एलएल.बी./ले.प्र. स...

720वीं सैन जयंती विशेष: आदर्श युग निर्माता देश में सेन समाज की अलग पहचान।

@रामसेवक चौहान
एम.कॉम.,एम.ए.,एलएल.बी./ले.प्र.
संत सेन जी के जन्म के बारे में अलग-अलग मान्यताए दी गई हैं। इतिहासिक शोध के अनुसार लगभग पांच सौ वर्ष पूर्व भारत में मध्यप्रदेश के बान्धवगढ़ में एक महान संत सेन महाराज का अवतार हुआ था। भक्तमाल के सुप्रसिद्ध टीकाकार प्रियदास के अनुसार एवं अगस्त संहिता 132 के आधार पर संत शिरोमणि सेन महाराज का जन्म विक्रम संवत 1357 में वैशाख कृष्ण-12 (द्वादशी) दिन रविवार को वृत योग तुला लग्न पूर्व भाद्रपक्ष को चन्दन्यायी के घर में हुआ था। बचपन में इनका नाम नंदा रखा गया। नंदा बचपन से ही विनम्र, दयालु और ईश्वर में दृढ़ विश्वास रखते थे। कुछ लोग इनका जन्म स्थान ग्राम सोहल थाठीयन जिला अमृतसर साहिब में 1390 ईस्वी में मानते हैं। इनके पिता का नाम श्री मुकन्द राय जी, माता का नाम जीवनी जी एवं पत्नी का नाम श्रीमती सुलखनी जी था। यह बिदर के राजा के शाही नाई थे और उस समय के प्रमुख संत ज्ञानेश्वर जी के परम सेवक थे। 1440 ईस्वी में इन्होंने देह का त्याग किया था। इसका पता भक्तमाला राम सीतावली में रीवा नरेश रघुराज सिंह जी ने निम्न रूप में स्पष्ट किया है।

बान्धवगढ़ पूरब जो गायों,सेन नाम नापित तह पायों
ताकि रहे सदा यही रीति,करत रहे साघन सो प्रीति
तह को राजा राम घेला,बरन्यो जेही रामानंद को चेलों
करे सदा तिनकी सेवा का ही,मुकर दिखावें तेल लगाई
संत शिरोमणि सेन जी का इतिहास-
 संत सेन के दो पुत्र व एक पुत्री का उल्लेख मिलता है। सेन रामानंद जी के समावत सम्प्रदाय से दीक्षित होने से श्री राम सीता और हनुमान जी की उपासना करते और अपने भजनों में उनका गुणगान करते थे। वह उस काल के एक उच्च कोटी के भक्त कवि माने गये है। रामानंद जी से सेन जी ने दीक्षा से ली और सेन भक्त कहलायें। ऐसे कई प्रमाण उनके भक्ति के संबंध में इतिहासकार बताते है।  
पाँच-छ:सौ साल पहले बघेलखण्‍ड के बान्‍धवगढ़ नगर में एक परम संतोषी, उदार, विनयशील सेन नामक व्‍यक्ति निवास करता था। यह सेन संत नाई जाति के थे। सेन संत की भक्ति के बारे में ऐसा उल्लेख है कि राज परिवार की सेवा के लिऐ उनका नित्‍य राजभवन में आना जाना था। वह मेहनत-मजदूरी कर परिवार का भरण-पोषण करते और संत-सेवा में हमेशा लीन रहते थे, मानो भगवान ही उनके लिए सब कुछ है। राजा एवं नगरवासी उनकी नि:स्‍पृहता तथा सीधे-सादे उदार स्‍वभाव की सराहना और प्रशंसा करते थे। सेन संत रोज सुबह स्‍नान, ध्‍यान और भगवान भजन के बाद ही राजसेवा के लिये जाते थे। उनका काम राजा तथा राजवंश के लोगों के बाल बनाना और तेल लगाकर स्‍नान कराना दैनिक कर्म में था। सेन संत भगवान के महान कृपापात्र भक्त, परम संतोषी, उदार और विनयशील व्यक्तित्व के थे। एक दिन उन्‍होंने देखा कि एक भक्त मण्‍डली मधुर ध्‍वनि से भगवान के नाम का संकीर्तन कर रही है तो वह उनके भजन सुनने के लिए उसी और निकल गए। इस संत-समागम में वह इतने तल्लीन हो गये कि उन्‍हें इस बात का भी ध्‍यान नहीं रहा कि राजभवन में महाराज वीर सिंह के यहां अपने रोज के कर्तव्य के लिए जाना हैं। 
महाराज वीर सिंह उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे और सेन संतों के आतिथ्‍य और स्‍वागत-सत्‍कार में व्यस्थ हो गए थे। जब प्रभु ने देखा तो सेन संत के रूप में स्‍वयं लीलाविहारी राजमहल में पहुँच गये। उन्होंने कंधे पर गमछा, कैंची, दर्पण और अन्य सामान की पेटी लटका रखी है। उनके मुख पर अलौकिक किरणें, चेहरे पर प्रसन्न मुस्कान और क्रिया में विलक्षण नवीनता थी। उन्‍होंने राजा के सिर में तेल लगाकार, शरीर की मालिश कर और दर्पण दिखाकर संतुष्टि किया। लीलाविहारी के कोमल हाथों से राजा को आसीम सुख की प्राप्ती हुई, जितना पहले कभी नहीं हुई थी। मानो उस दिन राजा को सेन के रूप में कोई आलोकिक शक्ति का प्रतीक हुआ। भक्त मण्‍डली के जाने के बाद भक्त सेन को याद आया कि मुझे तो राजा की सेवा में भी जाना है। उन्‍होंने अपनी पेटी उठाकर घबराते हुए राजमहल को चल पड़े और राजा के नाराज होने की बात सोचने लगे थे। राजसैनिक ने उनकी घबराहट देकर बोला कि आप कुछ भूल तो नहीं आए। उन्होंने कहा कि मुझे आने में देरी हो गई। तो सैनिक बोला कि आप थोड़ी देर पहले राजभवन तो आए थे और आप सचमुच भगवान के भक्त हैं। आज तो राजा आपकी सेवा से इतने अधिक प्रसन्‍न हैं कि इसकी चर्चा सारे नगर में हो रही है। सेन संत को पूरा विश्वास हो गया कि मेरी अनुपस्थित सेन रूप धारण कर मेरी प्रसन्नता और संतोष के लिये भगवान को यहां आना पड़ा। उन्‍होंने भगवान के चरण-कमल का ध्‍यान कर  मन-ही-मन प्रभु से क्षमा माँगी। 
 सेन संत के राजमहल में पहुँचते ही राजा वीर सिंह बड़े प्रेम और विनय से उनसे मिले। तो भक्त सेन ने बड़े संकोच से विलम्‍ब के आने के लिये क्षमा माँगी और संतों की सेवा के बारे में बताया। राजा ने उन्हें तुरन्त आलिंगन में भर लिया और कहा कि मैं तुम्हारी सेवा से अति प्रसन्न हूँ। आज तुम्हारी सेवा बहुत ही सराहनीय थी। यह लो अपना पुरस्कार। यह कहते ही राजा ने अपने गले से सोने का हार उतारा तथा सेन जी के गले में डाल दिया। सेन जी को इस बात का बहुत आश्चर्य हुआ कि आखिर सेवा करने वह तो आए ही नहीं, तो कौन आया ? राजा वीर सिंह ने कहा- "राज परिवार जन्‍म-जन्‍म तक आपका और आपके वंशजों का आभार मानता रहेगा। भगवान ने आपकी ही प्रसन्नता के लिये मंगलमय दर्शन देकर हमारे असंख्‍य पाप-तापों का अंत किया है।" उस दिन से राजा भक्त सेन जी का बहुत आदर और सत्कार करने लगे। बान्‍धवगढ़ सेन संत की उपस्थिति से धन्‍य हो गया।

संत शिरोमणि सेन जी के उपदेश एवं धार्मिक यात्राएं-
महापुरुषों में शिरोमणि सेन जी महाराज का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। समकालीन भगत  सेन जी ने श्री रामानन्द जी से दीक्षा ग्रहण कर तीर्थ स्थानो की यात्राएं ज्ञान उर्पाजन के लिए की। इन तीर्थ स्थानों की यात्राओ के दौरान वे भेदभाव से ऊपर उठकर जगह-जगह प्रवचन करते और भटकी हुई मानवता को सत्य की राह पर लाने का प्रयास करते। हरिद्वार में ब्रहाम्णों के साथ छुआ छुत और जात पात के विषय पर सेन संत जी का शास्त्रार्थ हुआ। शास्त्रार्थ में ब्राहम्णों को पराजित करके यह साबित कर दिया कि मानवता ही सबसे बड़ा धर्म है न की जात-पात। सेन जी की बुवा शोभा देवी जी लाहौर में रहती थी। लाहौर में जाकर इन्होने रहीम खॉ हकीम से भी जरी का काम सीखा। संत कबीर के बुलाने पर सेन जी लाहौर से मुलतान आकर उन्होने मीराबाई को उपदेश दिया और यही रहकर प्रभु सत्संग में रम गए। धीरे-धीरे सेन जी ने सत्संग से पंजाब वालो का मन मोह लिया और संत शिरोमणि की उपाधि प्राप्त की। ऐसा उल्लेख है कि प्रताप पुरा जिला जालंधर में डेरा बाबा सेन भगत जी का दशर्नीय स्थल है। यहां प्रतिदिन सेन ग्रंथ से पाठ और विशाल भंडारे का आयोजन किया जाता है।
 संत सेन जी ने काशी भ्रमण के समय संत रविदास/रेदास के साथ भेंट की। काशी में भी ब्राह्राणो से शास्त्रार्थ में कर यह साबित कर दिया कि कोई भी मनुष्य जाति के आधार पर छोटा बडा नहीं होता क्योंकि भगवान ने सबको बराबर बनाया है। जातियां तो कर्म के अनुसार मनुष्यों की देन है। मध्यप्रदेश में भी संत सेन जी ने अधिकांश समय व्यतीत किया। महाराष्ट्र में सेन जी ने काफी समय प्रवास कर मराठी भाषा में 150 अभंगों की रचना की। संत सेन जी ने राजस्थान में जगह-जगह भ्रमण करके अपने शब्दों, रसों, भजनों कविताओं और रचनाओं से अवगत करवाया। सेन भक्ति पीठ जोधपुर द्वारा विभिन्न नगरो के चौराहों पर सेन प्रतिमाओं की स्थापना तथा मार्गो का सेन जी के नाम पर नामकरण किया गया।
इसके अलावा संत शिरोमणि सेन जी महाराज ने दिल्ली, हरियाणा, मुल्तान, पंजाब, श्रीनगर, राजस्थान, उडीसा तथा महाराष्ट्र के विभिन्न स्थानों व तीर्थस्थानों पर अपने सत्संग की गंगा बहाई। इस प्रकार सेन जी ने अपने उपदेश सभी प्रांतों में किये थे। उन्होनें जाति व धर्म से ऊपर उठकर कार्य किए और सच्ची मानवता का संदेश दिया। उन्होने खुद भी ग्रहस्थ जीवन की जिम्मेवारी निभाते हुए धार्मिक कर्तव्यों का आजीवन पालन किया। सेन शिरोमणि सेवा, प्रेम, भक्ति व मधुर व्यवहार को संतों का प्रमुख लक्षण मानते थें। समाज में फैली कुप्रथाओं की आलोचना करते और उन्हें दोष पूर्ण बताकर समाज सुधार के लिए हर सम्भव प्रयास करते थे। उन्होने सम्पूर्ण जाति को ब्रहम ज्योति का स्वरूप बताया तथा मानवता के प्रति सेवा भाव, दया, प्रेम और भक्ति की प्रेरणा तथा वह प्रेम मार्ग द्वारा ही ईश्वर को प्राप्त करना चाहते थे। धर्म व जाति के आधार पर किसी को छोटा बडा न मानकर सभी से समान रूप से प्रेम करना ही उनकी सबसे बडी ईश्वरीय भक्ति थी। 

संत शिरोमणि सेन जी की रचनाएं-
संत शिरोमणि सेन जी महाराज ने हिन्दी, मराठी, गुरुमुखी और राजस्थानी में सेन सागर ग्रंथ रचा, जिसमें 150 गीतों का उल्लेख मिलता है। गुरुग्रंथ साहब में भी सेन जी के कुछ पद संकलित है। संत शिरोमणि सेन जी महाराज आध्यात्मिक गुरू एवं समाज सुधारक के साथ उच्च कोटि के कवि भी थे। पंजाबी भाषा (गुरूमुखी) में हस्तलिखित सेन सागर ग्रंथ उपलब्ध है। कहा जाता है कि इसकी एक फोटो प्रतिलिपि देहरा बाबा सेन भगत प्रतापपुरा जिला जालंधर पंजाब में सुरक्षित रखी गई है। इसमें दो प्रकार की रचनाए दर्ज है। पहली रचनाओं में संत सेन जी की वाणिया दर्ज है। जिनकी मूल संख्या 62 है। दूसरी रचना सेन जी के जीवन से संबंधित श्रद्धालु भक्त या किसी परिवार के सदस्य द्वारा लिखी गई है। सेन सागर ग्रंथ सबसे प्राचीन ग्रंथ माना जाता है। इतिहासकार एच0एस0 विलियम ने अपने शब्दों में अभिव्यक्त करते हुए कहा था कि सेन संत जी उच्च कोटि के कवि थे। उनकी अलग अलग भाषाओं की रचना उनकी विद्वता को प्रमाणित करती है। उनकी मधुर रचनाऐं तथा भजन बडे मनमोहक व भावपूर्ण थे।

सैन जी अपनी वाणी में लिखते हैः- सब जग ऊंचा, हम नीचे सारे।  नाभा, रविदास, कबीर, सैन नीच उसारे।।"सेन सागर ग्रंथ में सेन जी भगत रविदास जी साखी येप भगतावली में लिखते हैः-

 ' रविदास भगत ने ऐसी कीनी ,ठाकुर पाया पकड अधीनी 
                      तुलसी दल और तिलक चढाया ,भोग लपाया हरि धूप दवायां
                       सेन दास हरिगुरू सेवा कीनी,राम नाम गुण गाया।।'
 इनके साहित्य की सबसे बडी उपलब्धि भी गुरूग्रंथ साहिब में आपकी वाणी का दर्ज होना है। जिससे आपको बहुत बडा सम्मान प्राप्त हुआ और सेन समाज का भी गौरव बढा है। गुरूग्रथं साहिब में जहां सिक्खों के सभी गुरूओं की वाणिया दर्ज है। वही सभी संतों को इसमें सम्मान दिया गया है। जिसमे रविदास व कवीरदास के साथ साथ सेन जी महाराज भी एक है। सेन जी द्वारा रचित बहुत सी रचनाए गुरूग्रथं साहिब में संग्रहित है जिनमें गगन बिच थालू प्रमुख है। 15 भक्तों की वाणी को भी इस विश्व प्रसिद्ध ग्रंथ में संभाल कर रखा है। गुरू अर्जुनदेव जी ने भगतों की महिमा गाते हुए सबसे पहले कबीर का नाम लेते हुए कहते है कि कबीर बहुत भले भगत थे वह तो रासों के भी दास थे। उनका महागान करते हुए दूसरा नाम गुरूजी सेन जी का लेते है। इन्होने भगत सेन जी का उत्तम भगत की पदवी के साथ प्रशंसा की है।
अंतिम समय सैन समाज की महान विभुति परम श्रद्धेय परम संत सच्ची मानवता के पुजारी संत शिरोमणि सेन जी महाराज का अंतिम समया काशी में गुजरा जो उस समय संत महात्माओ का बहुत बडा केन्द्र माना जाता था। यही पर सेन जी ने भी अपने आश्रम की स्थापना की तथा यहीं भक्ति में लीन रहने लगे। इस प्रकार सेन सागर ग्रंथ के अनुसार सेन जी माघ मास की एकादशी विक्रमी संवत 1440 को ज्योति ज्योत मे समा गए। 
सेन समाज उनके आदर्शो को अपनाकर वर्तमान सेन समाज मे फैली कुरीतियों, पाखंडवाद, अंधविश्वास, द्वेष भावना, नशाखोरी, मृत्यु भोज एव दहेज प्रथा जैसी कुरीतियो का प्ररित्याग कर उन्हे समाज से खत्म करने का संकल्प दोहराता है ताकि आने वाली पीढियों का भविष्य उज्जवल बन सके। यही संत सेन जी के प्रति समाज की सच्ची श्रद्धांजली होगी।

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