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लॉकडाउन के बीच बेजुबान, बेसहारा जानवरो के लिए मसीहा बनी गाँव की बालिकाएं।

लॉकडाउन के बीच बेजुबान, बेसहारा जानवरो के लिए मसीहा बनी गाँव की बालिकाएं। जोधपुर/भोपालगढ़। कोरोना वायरस ने लोगों की जिंदगी की रफ...

लॉकडाउन के बीच बेजुबान, बेसहारा जानवरो के लिए मसीहा बनी गाँव की बालिकाएं।

जोधपुर/भोपालगढ़। कोरोना वायरस ने लोगों की जिंदगी की रफ्तार को थाम दिया तो सरकार ने आम लोगो की जिंदगी को रफ्तार देने और कोरोना से बचाव करने को देश मे 21 दिन का लॉक डाउन कर दिया।इस लॉक डाउन में समाज सेवियों ने खूब लोगो की मदद की लेकिन बेजुबान और बेसहारा पशुओं और जानवरों की सुध लेने वाला कोई नज़र नही आया। पिछले 14 दिन से लोग घरों में कैद होने की वजह से इन बेजुबान प्राणियों का खाना पीना बंद हो गया। 

आम आदमी जो घर से ऐसे बेजुबान जानवरो को खाना डालता थे, लेकिन लॉक डाउन के कारण घरों में लोग कैद होने के बाद ये बेचारे बेजुबान और बेसहारा पूरी तरह से बेबस हो गए और खाने पीने तक के लाले पड़ गए। आवारा, बेसहारा और बेजुबान जानवरो का एक मात्र इंसान ही सहारा होता था। 
इन सबके बीच यहां आपको क्षेत्र के बागोलिया गांव में अलग ही नजारा देखने को मिलेगा। यहाँ हर सुबह छोटी सी तीन बालिकाएं हमेशा गायों को चारा खिलाती दिखाई देती हैं। यह बालिकाएं लगभग 25 से 30 बेजुबान जानवरों को चारा खिलाती है।
निशा, मोनिका व रितिका खोथ ने इनकी सुध लेते हुए, अपने घर के आस - पास आवारा घूमने वालें गौवंश को चारा खिला रही हैं। हमेशा सुबह मूंग का चारा व कुतर खिलाई जाती हैं।

निशा व मोनिका का कहना हैं की जब तक लॉक डाउन रहेगा वो इन बेजुबानों के खाने की भी रोज व्यवस्था करती रहेंगी ताकि ये बेजुबान भी भूखे न रह सके।

मोनिका ने बताया की यह सेवा करने की सिख मेरे काका किशोर खोथ से मिली और गायों के लिए चारे की व्यवस्था मेरे दादा भला राम और काका किशोर खोथ ने की। इसके अलावा एक पाखलिया चारे की व्यवस्था जन सहयोग से मिली हैं।

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