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खेतीबाड़ी से होगी नई शुरुआत, कोरोना से बिगड़ी अर्थव्यवस्था।

खेतीबाड़ी से होगी नई शुरुआत, कोरोना से बिगड़ी अर्थव्यवस्था। - शहरों में बेरोज़गारों का बेहाल, लोग पलायन के लिए तैयार। विश...

खेतीबाड़ी से होगी नई शुरुआत, कोरोना से बिगड़ी अर्थव्यवस्था।

- शहरों में बेरोज़गारों का बेहाल, लोग पलायन के लिए तैयार।

विश्वव्यापी महामारी कोरोना वायरस के चलते दुनिया भर में लाखों लोग अपनी जान गंवा चुके हैं। लोगों की जान बचाने के लिए दुनिया के लगभग सभी देशों में इस समय तालाबंदी लागु हैं। देश-विदेश की सभी हवाई उड़ान सेवाओं के साथ ही देश के भीतर आवागमन के सारे साधन बंद हैं। दुनिया भर के हर देश की इकोनॉमीक स्थिति डांवाडोल हुई हैं तो उसमें भारत भी अछूता नहीं हैं। भारत की इकोनोमी में विदेशी कारोबार का जितना महत्व पिछले दो-तीन दशकों में बढ़ा हैं उतना हमारा घरेलू उत्पाद नहीं बढ़ पाया हैं। 

भारतीय इकोनोमी का मूलभूत आधार कृषि रहा हैं जिसे हम कई साल पहले ही पीछे छोड़ चुके हैं। देश की अधिकांश आबादी शहरों की चका चौंध से प्रभावित होकर गांव की खेती को भुल चुकी हैं। पिछले दो-तीन दशक से लोग शहर में आकर काम करने के साथ वे लोग अपने परिवार को भी शहर का हिस्सा बना चुके हैं। नौकरी पेशा करोड़ों लोग अपने परिवार के साथ मुंबई, चेन्नई, दिल्ली एवं कोलक़ोता जैसे शहरों के आस पास स्थायी रहवासी बन गए हैं। छोटे मोटे कारख़ानों में काम करने वाले मज़दूर, कंसट्रकशन क्षेत्र के मज़दूर के अलावा अनेक सेवा क्षेत्र की कंपनीयों के कर्मचारी इन्ही बड़े शहरों के आस पास के उपनगरों में विकसित जुग्गी झोंपड़ियों सहित ऊँची इमारतों में रहते हैं।शहरों में लागु तालाबंदी के चलते लोग घरों में क़ैद हैं तो सारे कल कारख़ाने बंद हैं। एक तरफ़ कारख़ानों में उत्पादन बंद हैं तो दूसरी तरफ़ जरुरी वस्तुओं के अलावा अन्य सभी उत्पादों की खपत भी बिलकुल नहीं हैं। शहरों में रहने वाले लाखों लोग आज बेरोज़गार की भाँति घरों में बंद हैं। शहरों में रोज़ मज़दूरी करने वाले मज़दूरों के भूखे मरने की नौबत आ गई हैं तो कई लोगों को अपना बिजली बिल, घर का किराया अथवा होम लोन का ईएमआई चुकाना मुश्किल हो रहा हैं। अनेक परिवारों में कमाने वाला एक व्यक्ति हैं तो घर में चार-पांच लोग खाने वाले हैं लेकिन रहते हैं वे इन शहरों में ही हैं। शहर की ऐसो आराम वाली लाईफ स्टाइल एवं चका चोंध वाली ज़िंदगी के चलते गांव में साल भर में एक दो बार जाते जरुर हैं लेकिन अब उन्हें गांव की खेती बाड़ी में धूप में काम करना मुश्किल लगने लगा था। लाखों लोग शहरों में ऐसे हैं जिन्हें गांव में रहते अपने बड़े बुज़ुर्गों के साथ खेती बाड़ी का काम करना पड़ता हैं इसलिए वे इन शहरों की जुग्गी झोपड़ियों में रह लेंगे लेकिन गांव में रहने को राज़ी नहीं हैं। 

शहरों के हालात सुधरने में अभी कितने दिन लगने वाले हैं यह कोई कहने को तैयार नहीं हैं। ऐसे में लॉकडाउन के चलते शहरों में बेरोजगार लोगों का जीना मुश्किल होता जा रहा हैं। शहर के कारखानों में उत्पाद शुरू होने में महीनों भी लग सकते हैं। कारखानों में उत्पाद शुरू हो भी गए तो अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में एक्सपोर्ट-इंपोर्ट का कारोबार कब शुरू होगा उसका भी अंदाज़ किसी को नहीं हैं। कोरोना का इलाज अभी तक डॉक्टर वैज्ञानिकों के पास सिर्फ़ खोज का विषय हैं और उससे बचने का एक मात्र उपाय फ़िलहाल पुरी दुनिया के पास सोश्यल डिसटेंसिंग के अलावा और कुछ भी नहीं हैं। 

दुनिया भर के तमाम देशों की इकोनोमी इस वक़्त बिगड़ी हुई हैं इसमें कोई दो राय नहीं हैं। अब इसे पटरी पर लाने में कितना समय लगेगा यह भी एक बहुत बड़ा कठिन सवाल हैं। किसी भी देश की इकोनोमी को पटरी पर लाने के लिए सबसे पहले उस देश की इकोनोमी को समझना जरुरी हैं। हमारा देश वैसे तो एक कृषि प्रधान देश हैं लेकिन हमारे देश की जीड़ीपी का पिछले दो-तीन दशकों का लेखा जोखा अगर देखा जाए तो उसमें औसतन सबसे ज़्यादा आय सर्विस इंडस्ट्री से आ रही हैं उसके बाद मेनूफेक्चरिंग तो तीसरे नंबर कृषि क्षेत्र से आ रही हैं। कुल जीडीपी का पंद्रह प्रतिशत एग्रीकल्चरए पचीस प्रतिशत इंडस्ट्रीयल से तो साठ प्रतिशत सर्विस सेक्टर से आय मिल रही हैं। देश का मुख्य सेक्टर कृषि जिससे सबसे कम आमदनी होना एक चिंता का विषय हैं।

देश की आज़ादी के बाद कृषि सेक्टर को मज़बूत करने के लिए जो कोशिश की जानी चाहिए शायद उसमें बहुत बड़ी कमी रही हैं इसलिए हमारा मूल सेक्टर कृषि पिछड़ता जा रहा हैं। समय रहते कृषि सिंचाई प्रबंधन हेतु जल स्रोत का आंक़लन किया जाए तो कृषि में भारत की स्थिति दुनिया में नंबर वन हो सकती हैं। आज पुरी दुनिया वेज़ीटेरियन फ़ूड की ओर बढ़ रही हैं। नॉनवेज फ़ूड का प्रभाव हम कोरोना वायरस के रूप में एक तबाही को देख ही रहे हैं। ऐसे में पुरे विश्व में कृषि उत्पादित अनाज खाद्य सामग्री की डिमांड बढ़ने वाली हैं। शहरों से गांव की ओर पलायन एक बार शुरू हो चुका हैं लोग अपने घर गांव जाना चाहते हैं। मज़दूर वर्ग के लोग लॉकडाउन में ढील का इंतज़ार कर रहे हैं। लॉकडाउन में जैसे ही थोड़ी बहुत छूट मिलती हैं तो लोग अपने गांव जाने के लिए बोरियाँ बिस्तर बांध रखे हुए हैं। 
सरकार भी किसानों को खेती के कार्य में छूट देने पर विचार कर रही हैं। किसानों को खेती कार्य में छूट के साथ सरकार सिंचाई जल प्रबंधन हेतु विशेष कार्य योजना बनाए तो हमारा देश जल्द ही आर्थिक रूप से एक मज़बूत इकोनोमी की ओर आगे बढ़ेगा।
भरत कुमार सोलंकी वित्त विशेषज्ञ

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