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इसे कहते हैं मुकंदर का सिकंदर, जाने पूंजाराम के संघर्ष की कहानी।

इसे कहते हैं मुकंदर का सिकंदर, जाने पूंजाराम के संघर्ष की कहानी। बाड़मेर/बायतु। हम पाठकों को हर रोज किसी न किसी व्यक्ति के जीवन ...

इसे कहते हैं मुकंदर का सिकंदर, जाने पूंजाराम के संघर्ष की कहानी।

बाड़मेर/बायतु। हम पाठकों को हर रोज किसी न किसी व्यक्ति के जीवन के संघर्ष के बारे में बताने की कोशिश करते हैं। इसी कड़ी में आज हम आपको रूबरू करवाते है एक ऐसी शख्सियत से जिन्होंने तीन बार जिंदगी की जंग जीतकर, लोगों को यह सिखाया है कि संघर्ष का नाम जीवन है, जिसने संघर्ष करना सीख लिया, वो कभी हारता नही।
हम बात कर रहे हैं बायतु उपखण्ड के गिड़ा क्षेत्र के शहीद प्रेम सिंह के गांव शहर ग्राम पंचायत के मूर्तिकार पूंजाराम पंवार की। पिता भंवराराम, माता इंद्रा देवी की छह सन्ताने हैं, उन्ही में से एक संतान हैं पूंजाराम। अपने ही गांव में आठवीं तक पढ़ने के बाद 9वीं उण्डू विद्यालय से की, ततपश्चात परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण जोधपुर जाकर कमठे का काम शुरु किया, वहां उन्होंने कमठे के साथ प्राइवेट 10वीं से 12वीं तक की पढ़ाई भी की। उस वक्त एक हादसा हुआ, वे तीसरी मंजिल पर रस्से के सहारे दीवार पर कार्य कर रहे थे, रस्से के टूटने से नीचे गिरने के कारण कमर में चोट लगने से एक साल तक कार्य पर नही जा सके और पढ़ाई भी छूट गयी। वहाँ से 2003 में वापस घर आये ओर बायतु में एक एनजीओ लोक कल्याण संस्थान एलकेएस जॉइन किया। इस दौरान एनजीओ के कार्य के साथ-साथ एलआइसी व सहारा इंडिया में अभिकर्ता के रूप में भी कार्य किया।
पंवार  2002ल7-08 में वापस भवन निर्माण के कार्य के लिए फैमिली सहित जोधपुर चले गए। वहां पास में ही एक मुस्लिम मूर्तिकार से मूर्ति कला सीखी, फिर कमठे के कार्य को छोड़कर 6 महीने तक बिना पेमेंट के मूर्ति निर्माण कार्य किया। साथ ही साथ अपने छोटे भाई को जोधपुर गांधी स्कूल में दाखिला दिलाया। खास बात यह भी हैं कि उस समय गांधी स्कूल में दाखिला बिना स्थानीय पहचान के नही होता था, यहाँ उनकी राजपूत धर्म बहन ने दाखिला दिलवाने में सहयोग किया।

मार्च 2011 में एक और हादसा घटित होता है:
पंवार अपने छोटे भाई की शादी पर जोधपुर से गोगादेव बस से घर आ रहे थे, उस बस का एक्सीडेंट हो  गया, जिसमें उनकी सीट के पास वाली सीट पर बैठा हुआ एक व्यक्ति खत्म हो गया था, उसमें इनको भी चोट लगी, जिसके कारण उनकी आवाज भी चली गयी थी। बेड रेस्ट व मेडिकल ट्रीटमेंट से 6 माह बाद स्वस्थ हुए।
स्वस्थ होने के बाद 2012 में आपने नरेगा व लोक अधिकार नेटवर्क, बाड़मेर कार्य किया। 2012-13 आपने नेहरू युवा मंडल का रजिस्ट्रेशन कर वंचित शोषित वर्ग के लोगों को इसमें जोड़कर इनके साथ हो रहे भेदभाव के खिलाफ आवाज उठायी व प्लॉट अलाउटिंग के मुद्दे व आंगनवाड़ी की सम्पूर्ण कार्य प्रणाली में पारदर्शिता के लिए आवाज उठायी, जिसकी बदौलत तत्कालीन जिला कलेक्टर बाड़मेर वीणा प्रधान ने प्रशस्ति पत्र देकर उन्हें सम्मानित किया। 
2012 से आपने नरेगा कार्य एनरॉलमेंट, ई-मित्र कियोस्क के साथ -साथ मूर्ति निर्माण कार्य जारी रखा।
उस दौरान आपके हाथों से निर्मित डॉक्टर भीमराव अंबेडकर की 14 मूर्तियां भीलवाड़ा जिले के सर्कल में लगवाई गयी।
2015 से 2017 तक उक्त कार्य के साथ - साथ बाड़मेर में तेल गैस की खोज की कम्पनी केयर्न में सुपरवाइजर पद पर कार्य किया। उसी दौरान 2015-16 में आईसीआईसी बैंक जीरो बेलेंस एटीएम के माध्यम से टीम के साथ बाड़मेर के हर क्षेत्र में करीब 6 लाख अकॉउंट खोले।
2016 में आपने पूरे बाड़मेर में घर - घर गांव - गांव घूमकर पानी के सेम्पल लेकर देवीसिंह व संजय के सहयोग से लैब टेस्टिंग का कार्य किया।
2017 में राजीव गांधी सेवा केंद्र शहर सरकारी ई - कियोस्क का चयन पूंजाराम के नाम से शहर ग्राम पंचायत में हुआ। 2018 में दिव्यांग, विधवा व वृद्धा पेंशन में 300 के करीब पेंशनर्स इस योजना नामांकन कर लाभान्वित किया।
2019 से अब तक करीब 750 लोगों को मल्टी मार्कटिंग नेटवर्क वेस्टिज कम्पनी में जोड़कर सिल्वर मेडल प्राप्त कर सिल्वर डारेक्टर बने।
वर्तमान में ई-मित्र व मूर्ति निर्माण कार्य करते है। साथ ही पंवार मृत्यु भोज, बाल विवाह, नशा आदि के सख्त खिलाफ है, मृत्युभोज में खाना खाने कभी नही जाते।

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