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नहीं रहें गीतकार योगेश: जिंदगी कैसी ये पहेली हाय रे

नहीं रहें गीतकार योगेश: जिंदगी कैसी ये पहेली हाय रे @नवीन शर्मा मुंबई। हिंदी सिनेमा में साठ और सत्तर के दशकों को गीतों के ...

नहीं रहें गीतकार योगेश: जिंदगी कैसी ये पहेली हाय रे

@नवीन शर्मा
मुंबई। हिंदी सिनेमा में साठ और सत्तर के दशकों को गीतों के लिहाज से स्वर्णिम समय माना जा सकता है। इस दौर के बेहतरीन गीतों की रचना में गीतकार योगेश का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा है। योगेश ने अपने सहज व सरल शब्दों से हिन्दी फिल्मी गीतों की बगिया में एक से बढ़कर एक खूबसूरत गीतों के फूल खिलाएं हैं जिनकी कभी ना खत्म होने वाली खूशबू का आनंद श्रोता सदियों तक     लेंगे।

पिता की असामयिक मौत 
गीतकार योगेश का जन्म लखनऊ में हुआ था। इनके पिताजी थान सिंह गौड़ इंजीनियर थे। उनके पिता की मौत उस समय हो गई जब वे कॉलेज में पढ़ रहे थे।
पिता की असामयिक मौत होने से परिवार चलाने की जिम्मेदारी योगेश के कंधों पर आ गई। उन्होंने उन लोगों से मदद मांगी जिनकी मदद इनके पिताजी ने की थी लेकिन कोई नौकरी नहीं मिली तो वे बंबई चले गए।

इनके साथ बचपन के मित्र सत्यप्रकाश भी थे। उस समय इनकी आयु मात्र 17 वर्ष थी। ये अपने चचेरे भाई बजेन्द्र गौड़ से मिले जो स्वयं एक लेखक थे व इंडस्ट्री में काफ़ी कुछ जमे हुए थे। उनसे किसी भी तरह का काम दिलाने को कहा लेकिन उन्होंने टाल दिया। उनके रूखे व्यवहार से इनका स्वाभिमान बहुत आहत हुआ और अपने मित्र के प्रोत्साहन पर इन्होंनें अपने बूते पर फ़िल्म जगत में अपना मकाम बनाने का निश्चय किया। इन्हें फ़िल्म-निर्माण के किसी भी क्षेत्र में न तो कोई प्रशिक्षण मिला था न कोई अनुभव था और न ही कोई विरासत थी। बंबई में अपने लक्ष्य की तलाश में भटकते हुए अपने मनोभाव और विचारों को कविताओं के रूप में व्यक्त करने लगे।

रॉबिन बैनर्जी के साथ शुरू हुआ फिल्मी सफर
इनकी भेंट संगीत निर्देशक रॉबिन बैनर्जी से हुई। जिनके साथ ने इन्हें सिखाया की फ़िल्मी गीतों के बोल पहले से निश्चित धुनों के अनुरूप लिखे जाते हैं। इन्होनें वही करना शुरू किया और रॉबिनजी की धुनों पर कुछ गीत लिख कर उन्हें दे दिए।  एक वर्ष के संघर्ष के बाद इनके लिखे 6 गीत और रॉबिन की धुनें “सखी रॉबिन” (1962)  फिल्म में प्रयोग हुईं। इनमें से एक गीत “तुम जो आओ तो प्यार आ जाए” ने ख़ासी लोकप्रियता भी अर्जित की। अगले 7-8 वर्ष तक इन्होंने कुछ छोटे बजट की फिल्मों के लिए खूबसूरत गीत लिखे जिन्हें फिल्मों के न चलते, बहुत अधिक सफ़लता नहीं प्राप्त हुई। इस दौर की ये फ़िल्में, “स्टंट फिल्म्स ” ही थीं जैसे कि “जंगली राजा”, “रॉकेट टार्ज़न” (’63), “कृष्णावतार “, “मार्वल मैन “, “टार्ज़न एंड डेलिलाह” (’64), “फ्लाइंग सर्कस”, “Adventures of Robinhood” (’65), “हुस्न का ग़ुलाम”, “रुस्तम कौन”, “Spy in Goa “, “टार्ज़न की महबूबा” (’66), “एक रात” (’67), “लुटेरा और जादूगर” (’68), “S.O.S जासूस 007” (’69)। इनमें से कई फ़िल्मों के संगीतकार रॉबिन बैनर्जी थे।

खूबसूरती के वर्णन का सर्वश्रेष्ठ गीत
1967 में प्रदर्शित हुई फ़िल्म “एक रात” के गीत “सौ बार बनाकर मालिक ने सौ बार मिटाया होगा …” ने भी काफ़ी लोकप्रियता प्राप्त की। योगेश ने एक इंटरव्यू में बताया है कि यह गीत प्रसिद्ध गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी को बहुत पसंद था वो कहते थे कि खूबसूरती के वर्णन का यह सबसे बेहतरीन गीत है। परन्तु इस गीत के बाद भी अभी सफ़लता और योगेश के बीच कुछ दूरियाँ बनी रहीं।

सलिल चौधरी से जुगलबंदी
योगेशजी का भाग्य-परिवर्तन तब हुआ जब ये सबिता बैनर्जी के माध्यम से सुप्रसिद्ध संगीतकार सलिल चौधरी के संपर्क में आये। 1968-69 में योगेश के लिखे में बने परन्तु वो फ़िल्में पूरी नहीं हुईं। अंततः1970 में सलिल दा ने योगेश को पहली बार एक बड़ी फिल्म आनंद में मौका दिया। इसमें योगेश ने अपनी काव्य प्रतिभा का बेहतरीन परिचय देते हुए “ज़िंदगी कैसी है पहेली हाय” और “कहीं दूर जब दिन ढल जाए जैसे लाजवाब गीतों की रचना की। दोनों गीतों ने ख़ासी लोकप्रियता हासिल की और योगेश के गीतकार जीवन के सफ़लतम चरण का प्रारंभ हुआ। उन्होंने सलिलजी के संगीत-निर्देशन में नियमित रूप से गीत लिखने का सिलसिला शुरू किया। जिसके चलते इस जोड़ी ने “आनन्द” (’70), “अन्नदाता”, “अनोखा दान” , “मेरे भैया” (’72), “रजनीगंधा” (’74), “छोटी सी बात” (’75), “आनंदमहल”, “मीनू” (’77), “जीना यहाँ” (’79), “Chemmeen Lehren”, “नानी माँ”, “Room No. 203” (’80), अग्नि परीक्षा (’81), आदि फिल्मों के माध्यम से जनता को अत्यंत मधुर गीत दिए जिन्होंने अत्याधिक लोकप्रियता भी प्राप्त की। 1988 में जारी हुई “आखिरी बदला”, इस जोड़ी की अंतिम भेंट थी।

एसडी बर्मन व  पंचम का मिला साथ
सलिल दा के बाद संगीत निर्देशक एसडी बर्मन व उनके पुत्र आर डी बर्मन के साथ योगेश ने काम किया। बड़े बर्मन साहिब के साथ इन्होनें मात्र दो फ़िल्में की – “उस पार” (’74) व “मिली” (’75)। परन्तु दोनों के गीत अब तक श्रोताओं के मन-मस्तिष्क में इतना घर किये हुए हैं कि अनायास ही ज़ुबान पर आ जाते हैं। मिली का गीत आए तुम याद मुझे और बड़ी सूनी सूनी है जिंदगी ये जिन्दगी में योगेश के गीतों के बोल इतने संवेदनशील हैं की ये दिल को बहुत गहराई तक छूतै हैं।

रिमझिम गिरे सावन
आरडी बर्मन के साथ योगेश ने  आठ फिल्मों में काम किया है। इनमें से “चला मुरारी हीरो बनने” (’77), “हमारे-तुम्हारे”, व “मंज़िल” (’79) के गीत प्रमुख रूप से सफ़ल माने जाते हैं। मंजिल फिल्म में अमिताभ बच्चन पर फिल्माया गया गीत रिमझिम गिरे सावन सुलग सुलग जाए मन गीत के बोल और संगीत दोनों लिहाज से कमाल का है। रिम-झिम गिरे सावन, सुलग-सुलग जाए मन” – भाव कुछ रत्यात्मकता में भी ओत-प्रोत हैं परन्तु शब्द अपनी शालीनता की सीमारेखा का कहीं उल्लंघन नहीं करते – बात भले ही “भीगे मौसम में लगी अगन” की हो या “भीगे आँचल” की, “दहके सावन” की हो या “बहके मौसम” की। सावन की एकाकी रातों में नींद न आने जैसे अतिसामान्य भाव की प्रस्तुति के लिए योगेशजी ने जिन पँक्तियों की रचना की, वे कुछ इस प्रकार हैं “जब घुंघरुओं सी बजती हैं बूंदे, अरमाँ हमारे पलके न मूंदे” । और अपने मित्र व सम्बन्धी समाज में एक नवप्रेम की भावना को व्यक्त न कर सकने की हिचकिचाहट कुछ इस तरह बखानी “महफ़िल में कैसे कह दें किसी से, दिल बंध रहा है किस अजनबी से” – क्या संभव है।

हृषिकेश मुख़र्जी व बासु चैटर्जी का साथ
फिल्म निर्देशक हृषिकेश मुख़र्जी व बासु चैटर्जी  का भी  योगेश की सफ़लता में ख़ासा योगदान रहा। जहाँ एक ओर हृषि दा के साथ इन्होंनें “आनन्द”, “मिली”, “रंग-बिरंगी” आदि जैसी सफ़ल फिल्मों के लिए गीत लिखे। वहीं दूसरी और बासु दा के साथ “रजनीगन्धा”, “छोटी सी बात”, “बातों बातों में”, “प्रियतमा”, “दिल्लगी”, “शौक़ीन”, “मंज़िल”, आदि फिल्मों में भी अपनी सृजनात्मकता का परिचय दिया।  योगेशजी के अधिकतर अविस्मर्णीय गीत इन्हीं दो निर्देशकों की फिल्मों के रहे हैं।

सहज व सरल भाषा में गीत लिखे
हिंदी सिनेमा के गीतों में शुरू से ही ऊर्दू का वर्चस्व रहा है। अधिकतर गीतों में अरबी, फारसी और तुर्की भाषा के शब्दों की इतनी बहुतायत होती थी  जिसकी वजह से  आम आदमी उतने कठिन शब्दों के अर्थ नहीं जानता था भले ही उसे गीत पसंद आ रहा हो।
ऐसे दौर में गीतकार योगेश ने सरल, शालीन व सुंदर हिन्दी में गीत लिखे। इनकी भाषा में क्लिष्टता नहीं थी परन्तु शुद्ध शब्दों का चयन अवश्य था व बहुत ही सुंदर व बोधगम्य उपमाओं का प्रयोग सहज भाव से किया गया था। “अनुरागी मन”, “मन की सीमा रेखा”, “मधुर गीत गाते धरती-गगन”, “अवगुण और दुर्गुणों का देखा जाना”, “बोझल साँसें”, “घनी उलझन”, “रात के गहरे सन्नाटे”, “सपनों का दर्पण”, “दिन सुहाना मौसम सलोना”, “अलबेला गीत”, “बंधन का सुख” और “साजन का अधिकार”, योगेश की कुछ अत्यंत शालीन अभिव्यक्तियाँ हैं जिन्हें हम सभी सरलता से सही गानों के सन्दर्भ में पहचान सकते हैं। योगेश अपनी इस विशिष्ट शैली का सारा श्रेय सलिल दा के सान्निध्य को देते हैं। इनका कहना है कि सलिल दा स्वयं इतनी उच्च कोटि के कवि थे कि उनके साथ हल्की भाषा का प्रयोग असंभव था। और इन गीतों की सफ़लता के बाद तो योगेश से सभी इसी शैली में गीत-रचना की अपेक्षा करने लगे।

कहीं दूर जब दिन ढल जाए ऐसे शामिल हुआ आनंद फिल्म में 
आनंद फिल्म के एक गीत  बारे में योगेश बताते हैं कि वह लिखा तो गया था फिल्म निर्देशक बासु भट्टाचार्य की फ़िल्म के लिए लेकिन वो बीच ही में बंद हो गयी। इसके बाद यह गीत बिक गया एलबी लक्ष्मण को। हृषि दा को वह गीत बहुत पसंद आया था। इस वजह से  राजेश खन्ना, सलिल दा और हृषिकेश मुख़र्जी ने बहुत मिन्नतें कर लक्ष्मण से ले लिया। यह लाजवाब गीत था – “कहीं दूर जब दिन ढल जाए” की ही बात हो रही है। यदि देखा जाए तो इस गीत के भाव बहुत साधारण हैं – लगभग पूरे गीत में (एक अंतरे को छोड़कर), गायक/नायक सिर्फ इतना व्यक्त कर रहा है की वह किसी को बेहद याद कर रहा है। परन्तु इस सरल से भाव की सुंदर अभिव्यक्तियाँ हैं “मेरे ख़यालों के आँगन में कोई सपनों के दीप जलाए”, “मचल के, प्यार से चल के छुए कोई मुझे पर नज़र न आए”, और फिर एक खोये सपने की उपमा दे कर “ये मेरे सपने, यही तो हैं अपने मुझसे जुदा न होंगे इनके ये साये” – मूल भाव वही रहा पर शब्दों का ताना-बाना इतना सुंदर कि गीत बेहद मनमोहक बन गया। और बाक़ी बचे एक अंतरे में आनन्द की व्यथा के साथ साथ उसके अन्य पात्रों से भावनात्मक बंधन की गहरायी का भी वर्णन हो गया।
“कहीं तो ये, दिल कभी, मिल नहीं पाते
कहीं से निकल आएँ, जनमों के नाते

घनी थी उलझन, बैरी अपना मन
अपना ही होके सहे दर्द पराये, दर्द पराये”
योगेश ने एक इंटरव्यू में बताया है कि  ये अंतरा उनके और उनके मित्र  सत्यप्रकाश के भावनात्मक सम्बन्ध का भी वर्णन करता है।

एक दूसरा गीत भी इसी याद करने के भाव से परिपूर्ण है  “न जाने क्यूँ होता है ये ज़िंदगी के साथ” की ओर है। इस गीत में सीधे सीधे शब्दों में नायिका की मन:स्थिति का वर्णन है जहाँ उसे नायक से रोज़ मिलने की आदत है – सिर्फ़ आदत – दोनों में से किसी ने अब तक अपने प्रेमभाव को स्पष्ट रूप से प्रकट नहीं किया है, विशेषतः नायिका ने। और एक दिन हीरो बिना कुछ कहे-सुने गायब हो जाता हैं। अब इस परिस्थिति में ये गीत नायिका के मनोभाव प्रकट करने के लिए एक पार्श्वगीत की तरह फ़िल्माया गया है। “जो अन्जान पल ढल गए कल, आज वो रंग बदल बदल, मन को मचल मचल रहे हैं छल, न जाने क्यूँ वो अन्जान पल, सजे बिना मेरे नयनों में टूटे रे सपनों के महल” और फिर अगले अंतरे में “वही है डगर, वही है सफ़र, है नहीं पास मेरे मगर, अब मेरा हमसफ़र, इधर-उधर ढूँढे नज़र, वही है डगर, कहाँ गईं शामें मदभरी, वो मेरे, मेरे वो दिन गये किधर” । 
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रजनीगन्धा” का गीत “कई बार यूं भी देखा है…”। इस पार्श्वगीत का प्रयोग दो पुरुषों के प्रति अपने आकर्षण से उद्विग्न नायिका की मनःस्थिति दर्शाने के लिए किया गया है। यदि गीत के बोलों पर ध्यान दें तो नायिका के मन का द्वन्द सहज ही स्पष्ट हो जाता है। गीत के मुखड़े में ही गीतकार ने पात्र के मन और मस्तिष्क के अन्तर्विरोध का आभास करवा दिया है, इन शब्दों से – “ये जो मन की सीमारेखा है, मन तोड़ने लगता है”, और इसी अपने ही मन से विरोधाभास की अगली कड़ियाँ हैं उसकी “अन्जानी प्यास” और “अन्जानी आस” जो मस्तिष्क की समझ की सीमाओं से बाहर प्रतीत होती हैं – मस्तिष्क शायद सामाजिक नियमों की हदों में मन के भावों का मूल्यांकन कर रहा है और उन्हें समझने में असमर्थ है। जहां पहले अंतरे में, बड़ी निपुणता से गीतकार ने फूलों का सांकेतिक रूप से प्रयोग करते हुए इस भ्रांतिग्रस्त नायिका के मनोभाव को प्रस्तुत किया है, ये कह कर “जीवन की राहों में जो खिले हैं फूल फूल मुस्कुराके, कौन सा फूल चुराके, रख लूं मन में सजाके” वहीं दूसरे अंतरे में तो पूरी उलझन अत्यंत स्पष्टता से श्रोताओं के समक्ष रख दी है। शब्द कुछ यूं चुने हैं “उलझन ये, जानूँ न सुलझाऊं कैसे, कुछ समझ न पाऊँ, किसको मीत बनाऊँ, किसकी प्रीत भुलाऊँ” । केवल इस एक गीत के माध्यम से फिल्म का केंद्र-विषय  सुस्पष्ट हो जाता है।

ज़िंदगी …कैसी है पहेली, हाए जीवन दर्शन से जुड़ा गीत
योगेश ने खुद जीवन में काफ़ी संघर्ष किया था। उनके कई गीतों में जीवन के दर्शन की झलक मिलती हैं। इस श्रेणी में “ज़िंदगी कैसी है पहेली हाय” याद आता है। यह गीत जीवन की क्षणभंगुरता, पल-पल बदलते स्वरुप और मृत्युपरान्त अनिश्चितता का वर्णन करता है। शब्दों का चुनाव कितनी कुशलता और सावधानी से किया गया है।

– “ज़िंदगी …कैसी है पहेली, हाए, कभी तो हंसाये, कभी ये रुलाये”, “एक दिन सपनों का राही, चला जाए सपनों के आगे कहाँ”। और अंतिम अंतरा तो पूरा ही गहन सोच में डाल देता है – “जिन्होंनें सजाए यहाँ मेले, सुख-दुख संग-संग झेले, वही चुनकर ख़ामोशी, यूँ चले जाएँ अकेले कहाँ”।
 इस गीत के विषय में योगेश कहते है कि ये गीत इन्हें लगभग ज़बरदस्ती ही मिला उस गीत की एवज में जो इनसे ग़लती से अन्नदाता फ़िल्म के लिए ऎसी धुन पर लिखवा लिया गया था जो पहले से “आनन्द” फ़िल्म में प्रयोग हो चुकी थी। पहले इस गीत का प्रयोग शुरू में क्रेडिट्स के समय होना था परन्तु राजेश खन्ना को गीत बहुत भा गया और उनके आग्रह पर इसे फ़िल्माया गया। और भाग्य की विडम्बना देखिये की वो गीत जिसकी रचना ही नहीं होनी थी, गीतकार की पहचान बनाने में प्रमुख गीतों में गिना जाता है।

संगीत निर्देशक उषा खन्ना व  राजेश रौशन के साथ भी इन्होनें कईं अच्छे व सफ़ल गीतों की रचना इसी दशक में की। वैसे इन्होनें अन्य छोटे-बड़े संगीतकारों, जैसे सुरेश कुमार, सुरेन्द्र कोहली, विजय राघव राव, बप्पी लाहिरी, वसंत देसाई, भूपेन्द्र सोनी, मीना मंगेशकर, श्यामल मित्रा, जी. एस. कोहली, वनराज भाटिया, कल्याणजी-आनंदजी, आदि, के साथ भी काम किया।
गीतकार के रूप में ये 2009 तक सक्रिय रहे हैं हालाँकि 1998 – 2002 की अवधि में इनकी कोई फिल्म नहीं आयी। अपने कार्यकाल में इन्हें  हेमंत कुमार (“दो लड़के दोनों कड़के” ’78), श्री सी रामचंद्र (“तूफ़ानी टक्कर” ’78) व श्री मदन मोहन (“चालबाज़” ’80) की बनाई धुनों पर भी गीत लिखने का अवसर मिला।

 नए संगीतकारों में इन्होनें निखिल-विनय, अन्नू मालिक, आदेश श्रीवास्तव, दिलीप सेन-समीर सेन आदि के साथ भी काम किया। अब तक की इनकी आखिरी फिल्म “सुनो न” (2009) के संगीत निर्देशक संजॉय चौधरी हैं जो कि सलिल दा के सुपुत्र हैं। चौधरी परिवार की ग़ैर-फ़िल्मी प्रस्तुति “Generations” के लिए भी इन्होंनें गीत लिखे हैं। 
अब तक योगेश ने लगभग 100 फ़िल्मों में, तकरीबन 350 गीत लिखे हैं। फ़िल्मी और ग़ैर-फ़िल्मी गीतों के अलावा योगेशजी ने कई टी वी धारावाहिकों के शीर्षक गीतों व विज्ञापन फिल्मों की तुकान्तक कविताओं की रचना भी की है।

लोकप्रिय गीत 
1 रजनीगन्धा फूल तुम्हारे
2 आये तुम याद मुझे
3 बड़ी सूनी सूनी है …
4 कोई रोको ना दीवाने को 
5 गुज़र जाए दिन
6 कभी कुछ पल जीवन के
7 निस दिन निस दिन
8 नैन हमारे, सांझ सखारे …
9 “कहाँ तक ये मन को अंधेरे छलेंगे
“10 ये जब से हुई है जिया की चोरी
11हम और तुम थे साथी

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