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मारवाड़ की धरती पर एक नई उम्मीद जगाता जाट राजपूत एकता संदेश।

मारवाड़ की धरती पर एक नई उम्मीद जगाता जाट राजपूत एकता संदेश। जाट एकता जिंदाबाद, राजपूत एकता जिंदाबाद, इन चीखते चिल्लाते नारों से मार...

मारवाड़ की धरती पर एक नई उम्मीद जगाता जाट राजपूत एकता संदेश।

जाट एकता जिंदाबाद, राजपूत एकता जिंदाबाद, इन चीखते चिल्लाते नारों से मारवाड़ की हर पगडंडी और हर ढाणी ऊब गई है,  इन दो समाज के बीच पड़ी दरार या चुनी दीवार की मुख्य वजह क्या थी,  कोई 60-70 के दशक में उतार-चढ़ाव वाली पथरीली पहाड़ों की राजनीतिक हलचल में ढूंढता है तो कोई सैकड़ों साल पुराने सामंतशाही के मलबे में।

माखन जैसे मारवाड़ में जहां मिश्री जैसी मीठी बोली हो वहां प्रेम रूपी उपवन होना चाहिए जबकि यहां नफरत, अदावत और बगावत की खेती की गई।

आजादी के विगत 70 सालों में मारवाड़ में सैकड़ों ऐसी सभा या ऐसी मंत्रणा हुई जिसका उद्देश्य एक दूसरे को राजनीतिक या वैचारिक लड़ाई में हराना था, मगर विगत 70 साल में मुश्किल से ही कोई बड़ी सभा हुई होगी जिसमें यह तय किया गया है कि अपने ही समाज के गांव और ढाणियों से आने वाले बच्चों को गुणवत्ता की शिक्षा कैसे दी जाए, ना ही ऐसी कोई सभा की होगी जिसमें यह तय किया गया हो कि अपने समाज के निचले तबके से आने वाले लोगों को पेयजल, कृषि जल या फिर आधारभूत सुविधा कैसे पहुंचाई जाए, इन सभा के नेतृत्व करने वाले, तथाकथित और स्वघोषित समाजसेवी चाहें तो इन लोगों की समस्याओं को शासन-प्रशासन, राजनीतिक या जन सहयोग के माध्यम से दूर कर सकते हैं मगर इतनी मेहनत करने से उन्हें मिलेगा क्या?
बड़े शहरों में बने सामाजिक छात्रावासों में छात्रों की जगह दबंग और तस्कर लोग वास कर रहे हैं, समाज सुधारक मौन… स्कूलों में शिक्षक नहीं, समाज सुधारक मौन… अस्पतालों में… मौन…टूटी सड़कें... मौन... मौन...
जब इन दोनों समाजों में छोटी मोटी लड़ाई या मतभेद हो जाएं तो ये सुधारक आकर नफरत की ऐसी रस्सी फेंकते हैं और सब के सब उसमें बाधं दिए जाते हैं, जिसमें बहुत ही कम मेहनत लगती है और फायदा इन समाज सेवकों की पीढ़ी दर पीढ़ी उठाती है।
मिश्री और मक्खन के संगम से बने मारवाड़ में ईर्ष्या और कलेह रूपी काले कंकड़ डाले गये, जिस से मारवाड़ का स्वाद बिगड़ चुका है, जिसकी कीमत मारवाड़ की कई पीढ़ियों ने भुगती हैं और कई आगे भी भुगतेंगी।
अगर मारवाड़ को पुनः मारवाड़ी मिठास लानी है तो जरूरी है कि यहां के सब समाजो को इंसानियत रूपी एकता की उंगलियां पकड़नी होगी। 
यह लेखक के निजी विचार हैं 
✍️ भटका राही ( चौधरी जसू जसनाथी )

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