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विश्व पर्यावरण दिवस पर ट्रीमैन लाम्बा की चेतावनी, जैविक हथियारों से खेलने की हिमाक़त ना करे चाइना

विश्व पर्यावरण दिवस पर ट्रीमैन लाम्बा की चेतावनी, जैविक हथियारों से खेलने की हिमाक़त ना करे चाइना जयपुर। वैसे तो पांच जून को दुन...

विश्व पर्यावरण दिवस पर ट्रीमैन लाम्बा की चेतावनी, जैविक हथियारों से खेलने की हिमाक़त ना करे चाइना

जयपुर। वैसे तो पांच जून को दुनिया भर में विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाता है। लेकिन ट्रीमैन ऑफ़ इंडिया के नाम से मशहूर पर्यावरणविद विष्णु लाम्बा ऐसे शख्स हैं, जिनके लिए हर दिन पर्यावरण दिवस होता है। ट्रीमैन लाम्बा ने विश्व पर्यावरण दिवस पर संदेश जारी करते हुए सभी को शुभकामनाएं दी, और उनकी यात्रा में प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूप से सहभागी बनने वालों का आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि कोरोना की वजह से उपजी परिस्थितियों ने एक महत्वपूर्ण संदेश और सिख हम सबको दी है। वह यह है कि प्रकृति की संगत में रहते हुए विकास यात्रा ही सार्थक दिशा में बढ़ सकती है। जहां प्रकृति का शोषण शुरू हुआ वहां कोरोना जैसे कई आपदाएं वैश्विक समाज के ताने-बाने को उधेड़ती रही। आज गंगा साफ होती जा रही है, जमुना का जल पीने योग्य हो गया है। यमुना में प्रदूषण के झाग का स्थान स्वच्छ जल ने ले लिया है। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि पिछले दो महीने तक प्रकृति को जीतने की महत्वाकांक्षा पर अंकुश लगा था। क्योंकि लॉक डाउन का यह अवसर है हमें फिर से सोचने के लिए कि हम प्रकृति के सहचर बने, सहभागी बने और श्रद्धा की दृष्टि से देखें बाजार की नजरों से नहीं। यदि हम इस कोरोना कालखंड की सीख को अपने जीवन में उतार लेंगे तो गंगा जमुना ही नहीं हमारे जीवन की दशा और दिशा भी पवित्र और शुद्ध हो जाएगी। इसलिए इस विश्व पर्यावरण दिवस पर संकल्प लें कि हमें प्रकृति का विजेता नहीं, उसका सहभागी बनना है। ट्रीमेंन लाम्बा ने कहां की मनुष्य ने प्रकृति के साथ जो दुस्साहस किया उसके परिणाम का नाम है कोरोना वायरस। हम इसके सकारात्मक परिणामों में जाएंगे तो ध्यान में आएगा कि ऐसे में प्रकृति ने स्वयं को संतुलित किया है। जिसके रहते वह विलुप्त प्रजातियां भी नजर आने लगी हैं, जिन्हें सालों पहले देखा गया था। उन्होंने आगे कहा कि वन्यजीवों का भक्षण करने वाले लोगों को वैश्विक समाज ने चाइना वायरस कहकर बहिष्कार किया है। अतः इसके दुष्परिणामों को समझकर विश्व शाकाहार की ओर बढ़ने लगा है। उन्होंने सबसे बड़ी प्रसन्नता व्यक्त की है कि भारत ने विश्व की जो सेवा की है, उसके फलस्वरूप बनी हमारी साख के कारण आज संयुक्त राष्ट्र जैसी वैश्विक संस्था ने भी विश्वास व्यक्त किया है कि अमेरिका जो बात उत्तरी कोरिया को हथियारों के दम पर नहीं समझा सका वह बात भारत शांतिप्रिय तरीके से समझा सकता है। ऐसे में चाइना को जैविक हथियारों से खेलने की हिमाकत नहीं करनी चाहिए। आज चाइना के कारण पूरा विश्व संकट में है। उन्होंने आगे कहा कि यह राष्ट्र के लिए शुभ संकेत है कि हम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सौर ऊर्जा को प्रोत्साहन देने के लिए वातावरण निर्माण करने में काफी हद तक सफल हो रहे हैं। लेकिन साथ ही साथ जरूरी है भी है कि गांव में बैठा किसान या मजदूर सौर ऊर्जा की पहुंच तक पहुंच सके। जलवायु संकट हमारे लिए सबसे बड़ी चुनौती हैं और उसका सामना विज्ञान और परंपरागत ज्ञान के आपसी संतुलन से ही होगा। जैव विविधता का संरक्षण हमारी सबसे बड़ी जिम्मेदारी होनी चाहिए। किंतु राजस्थान के सांभर में पक्षी त्रासदी, रणथंभौर राष्ट्रीय अभयारण्य में अवैध शिकार, झालाना लेपर्ड सफारी जैसे महत्वपूर्ण अभयारण्य में पशु पक्षियों के लिए पेयजल व खाद्य सामग्री का भाव दर्दनाक है।
उन्होंने श्री कल्पतरु संस्थान की ओर से सरकार से आग्रह किया कि जलवायु संकट को समग्रता में देखते हुए इसका सामना करने के लिए एक समेकित रणनीति एवं कार्य योजना तैयार करें। उन्होंने पर्यावरण एवं सेवाभावी कार्यकर्ताओं को प्रणाम करते हुए आभार व्यक्त किया। ट्रीमैन लाम्बा ने मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के वन्यजीव संरक्षण की पहल का स्वागत किया साथ ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मन की बात कार्यक्रम में पर्यावरण पर जोर देने को सार्थक बताया।

"ट्री मैन ऑफ इंडिया" :

- विष्णु लाम्बा : बिना सरकारी अनुदान दुनियाँ को दी पचास लाख वृक्षों की सौगात

आज विष्णु लाम्बा श्री कल्पतरु संस्थान के अध्यक्ष जरूर हैं, लेकिन उनका काम करने का ढंग कुछ ऐसा है कि हर कोई इनका कायल है। वे खुद को अतिसाधारण सा व्यक्ति मानकर कार्य करते हैं। बातचीत में विष्णु ने बताया कि 103 वर्षीय  स्व. धनप्रकाश त्याजी जी ने हमेशा उनका हौसला बढ़ाया और कठिन वक्त में हर प्रकार से मदद की। आज उनके जैसे चंद लोगों की वजह से ही मैं संघर्ष के रास्तों पर चलते हुए इस मुकाम पर पहुंचा हूं।

जयपुर । पूरी दुनिया आज पर्यावरण संकट के दौर से गुजर रही है। भारत की बात करें तो सरकार की अनदेखी और लोगों में जागरूकता की कमी के कारण पेड़ों की अंधाधुंध कटाई से पर्यावरण संकट तेजी से बढ़ता जा रहा है। इसका सीधा असर जहां मानव जाति पर हो रहा है वहीं पशु-पक्षियों और जल की उपलब्धता पर भी संकट गहराता जा रहा है। लेकिन इन सबके बावजूद प्रदेश का एक युवा जिसने पर्यावरण की रक्षा के लिए ना सिर्फ अपना घर बार छोड़ दिया बल्कि वह पिछले 27 सालों से प्रकृति को परमात्मा मानकर उसकी हिफाजत में जुटा है। हम बात कर रहे हैं 'ट्री मैन ऑफ इंडिया' विष्णु लाम्बा की, जिन्होंने आजीवन पर्यावरण की सेवा का संकल्प ही नहीं लिया बल्कि उसे बखूबी निभा भी रहे हैं। विष्णु लाम्बा के अथक प्रयासों से आज समाज में पर्यावरण संरक्षण को लेकर एक नई क्रांति का सूत्रपात हुआ है। विष्णु लाम्बा बिना सरकारी सहयोग के अब तक करीब छब्बीस लाख पेड़ जनसहभागिता से लगवा चुके हैं तथा इन्होंने अपनी जान पर खेलकर करीब 13 लाख पेड़ों को बचाया है और ग्याहरा लाख पौधे निःशुल्क वितरित भी किये है।
खास बातचीत में विष्णु लाम्बा ने बताया कि आज उनकी मुहिम से देश के 22 राज्यों के लाखों युवा जुड़ चुके हैं। साथ दुनियां के ज़्यादातर देशों के पर्यावरण के क्षेत्र में कार्यरत युवा भी अब उनके संपर्क में है। लाम्बा ने कहा कि उनको पूर्ण विश्वास है कि वो दिन दूर नहीं जब हर आम और खास उनकी मुहिम का हिस्सा बनेंगे और वो अपना मिशन पूर्ण करते हुए विश्व के सामने पर्यावरण जगत का श्रेष्ठ उदाहरण रखेंगे।

बचपन में पौधे चुराने वाला बना ट्री मैन :
पेड़-पौधे और पशु-पक्षियों से गहरा लगाव रखने वाले विष्णु लाम्बा का जन्म टोंक जिले के मेहन्दवास थाना क्षेत्र से तीन किलोमीटर दूरी पर बसे गांव लाम्बा में 3 जून, 1987 को हुआ। मात्र सात साल की उम्र से ही विष्णु ने अपने बाड़े (घर के पास स्थित जानवर रखने की जगह) में तरह-तरह के पौधे लगाना शुरू कर दिया। विष्णु पर पौधे लगाने का इतना जुनून सवार रहता था कि वे किसी के भी घर और खेत से पौधा चुराने में जरा सी भी देर नहीं करते थे। इनकी इस आदत से तंग आकर घरवालों ने उनियारा तहसील के रूपपुरा गांव में रहने वाली बुआजी के यहां पढऩे भेज दिया, लेकिन विष्णु का प्रकृति के प्रति प्रेम बढ़ता ही गया। इसके बाद विष्णु अपने ताऊजी एसएन शर्मा के साथ जयपुर आ गए। यहां भी इनका प्रकृति प्रेम कम नहीं हुआ और इन्होंने तत्कालीन जयपुर कलक्टर श्रीमत पाण्डे के जवाहर सर्किल स्थित घर में बनी नर्सरी से पौधे चुरा लिए। इस तरह एक पौधा चुराने वाला बच्चा आज देश का 'ट्री मैन ऑफ इंडिया' के नाम से पूरी दुनिया में प्रसिद्ध हो चुका है।

संन्यासियों के पास रहकर संस्कृति को जाना :
विष्णु लाम्बा का बचपन से ही पेड़-पौधों और साधु-संन्यासियों के प्रति झुकाव रहा है। माता सुशीला देवी से बचपन में सुनी रामायण और महाभारत की कथाओं का इन पर काफी असर हुआ। पिता श्रवणलाल शर्मा गांव में स्थित चारभुजा मंदिर के महंत है। पढ़ाई में कमजोर होने के कारण पिता ने गांव के तालाब किनारे स्थित बालाजी मंदिर के रामचंद्र दास महाराज के पास भेज दिया। विष्णु यहां पूरा दिन महाराज के पास रहते, कई बार तो रात को भी यहीं रुक जाते। कह सकते हैं कि पारिवारिक संस्कारों ने विष्णु को संन्यासियों के करीब लाने का काम किया। इसके बाद विष्णु संन्यास की ओर चल पड़े। उसी दौरान टोंक में बनास नदी के किनारे संत कृष्णदास फलहारी बाबा के संपर्क में आए और साधू दीक्षा लेने की जिद करने लगे। महाराज ने कहा कि तुम्हे बिना भगवा धारण किए ही बहुत बड़ा काम करना है। इसके बाद विष्णु ने साधू दीक्षा लेने का विचार त्याग दिया और अपना जीवन पेड़ों को समर्पित कर दिया।

56 से अधिक क्रांतिकारियों के परिवारों को तलाशा :
विष्णु लाम्बा ने आजादी के बाद पहली बार देश के 22 राज्यों में भ्रमण कर 56 से अधिक क्रांतिकारियों के परिवारों को तलाश कर शहीदों के जन्म और बलिदान स्थलों पर पौधारोपण जैसे कार्य कर देशभर में पर्यावरण का संदेश दिया। विष्णु ने देश के तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी, राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे, मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल, उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री योगी आदित्य नाथ, महाराष्ट्रा के मुख्य मंत्री देवेंद्र फड़नवीश, लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला आदि से शहीदों के परिजनों को मिलवाकर उनकी समस्याओं से अवगत करवाया। साथ ही भारत के इन महान क्रांतिकारी परिवारों के सम्मान में सैकड़ों कार्यक्रम करवाकर जनता में प्रकृति और संस्कृति का संदेश देते हुए राष्ट्र प्रेम की अलख जगाई ।

पूर्व कुख्यात दस्युओं को दिलाई पर्यावरण संरक्षण की शपथ :
फिल्म 'पान सिंह तोमर' से प्रेरित होकर विष्णु लाम्बा ने राजस्थान के चम्बल से चित्रकूट तक फैले चम्बल के बीहड़ों की करीब दो साल तक खाक छानी और पूर्व कुख्यात दस्युओं को अपनी मुहिम से जोड़ा। विष्णु ने मलखान सिंह, गब्बर सिंह, रेणु यादव, सीमा परिहार, मोहर सिंह, जगदीश सिंह, पंचम सिंह, सरू सिंह, पहलवान सिंह, बलवंता सहित कई पूर्व कुख्यात दस्युओं से मुलाकात की और उनके साथ भी रहे। विष्णु ने 20 मार्च, 2016 में जयपुर में आयोजित पर्यावरण को समर्पित पूर्व दस्युओं के महाकुम्भ 'पहले बसाया बीहड़-अब बचाएंगे बीहड़' समारोह के माध्यम से सभी पूर्व दस्युओं को पर्यावरण संरक्षण की शपथ दिलाई। इस तरह का आयोजन दुनिया में पहली बार जयपुर में आयोजित किया गया था।

हर साल पक्षियों के लिए लगाते हैं परिंडें :
अब तक लाखों पेड़ों को बचा चुके विष्णु लाम्बा का पक्षियों से प्रेम भी जग जाहिर है। वे पिछले पंद्रह वर्षों से गर्मियों में बेजुबान पक्षियों के लिए 'परिंदों के लिए परिंडा' अभियान चलाकर लाखों परिंडे लगा चुके हैं। इसके अलावा वे पिछले नो वर्षों से मकर संक्रांति पर चाइनीज मांझे से घायल होने वाले पक्षियों के लिए नि:शुल्क चिकित्सा शिविर का आयोजन कर रहे हैं, जिसमें हर साल हजारों पक्षियों का उपचार किया जाता है। विष्णु अपने संस्थान के माध्यम से घायल पशु-पक्षियों के लिए सालभर रेस्क्यू ऑपरेशन चलाते हैं।

मील का पत्थर बने 'श्री कल्पतरू संस्थान' के कार्य :
पर्यावरण संरक्षण के लिए अपना जीवन समर्पित कर चुके विष्णु लाम्बा ने 'श्री कल्पतरू संस्थान' की स्थापना की। इस संस्थान के माध्यम से विष्णु ने अब तक देशभर में लाखों पेड़ लगाए और वितरित किए। साथ ही विकास के नाम पर काटे जाने वाले लाखों विशाल हरे वृक्षों को कटने से बचाया।

- यह संस्थान पिछले 20 साल से एक पौधा नियमित रूप से कहीं न कहीं लगाता आ रहा है।
- संस्थान ने पर्यावरण विरोधी योजनाओं का विरोध कर लाखों हरे वृक्षों सहित असंख्य पशु-पक्षियों को बचाया।
- संस्थान ने देश के 100 गांवों को पर्यावरण की दृष्टी से आदर्श ग्राम (कल्प ग्राम) बनाने का संकल्प लिया है, जिसमें तीन गाँवों में विशेष नवाचारों के माध्यम से आदर्श ग्राम बनने की और हैं।
- संस्थान के प्रयासों से ऋग्वेद काल के बाद पहली बार ग्रीन वेडिंग (पर्यावरणीय विवाह) संपन्न कराया, जिसमें दहेज नहीं लेकर कन्यादान में सिर्फ कल्प वृक्ष के दो पौधे लिए गए।
- संस्थान ने विश्व में पहली बार पाली जिले की जैतारण तहसील में हाथियों पर वृक्षों की शोभायात्र निकलवाई। साथ ही प्रदेश के पांच सौ से अधिक वृक्ष मित्रों का सम्मलेन कराया, जिसमें गुड़ की लापसी केले के पत्तों पर परोसी गई।
- संस्थान लंबे समय से रेगिस्थान के जहाज ऊंट के संरक्षण व संवर्धन को लेकर अभियान चलाता रहा है, जिसे जुलाई 2014 में सरकार ने राज्य पशु का दर्जा दिया।
- संस्थान प्रदेश और विशेष रूप से टोंक में हो रहे राष्ट्रीय पक्षी मोर के शिकार का विरोध कर रोकथाम का प्रयास करता रहा है।
- संस्थान के प्रयासों ने जयपुर में होने वाले 'जयपुर साहित्य महाकुम्भ' में वर्ष 2015 से एक नया इतिहास रचते हुए माला और बूके के स्थान पर आने वाले सभी मेहमानों को तुलसी का पौधा देकर स्वागत करने की अनूठी परम्परा कायम की। इसका शुभारम्भ मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को तुलसी देकर किया गया।
- संस्थान ने सिन्दूर जैसी दुर्लभ प्रजातियों को संरक्षण देने का कार्य हाथों में लिया और अब वो 200 से अधिक दुर्लभ प्रजाति के पौधों को घर-घर पहुंचाने का कार्य कर रहा है।
- संस्थान में महिलाओं के लिए अलग से वुमन्स विंग बनाई गई है जिसमें हजारों लड़कियां और महिलाएं जुड़ी हुई हैं, जो पर्यावरण के साथ-साथ महिला ससक्तीकरण जैसे सामजिक सरोकारों से जुड़कर कार्य करती है।
- संस्थान हर वर्ष वृक्ष मित्र सम्मान समारोह, पक्षी मित्र सम्मान समारोह, पर्यावरण के क्षेत्र में सराहनीय सेवाएं देने वाले पत्रकारों, वीरांगनाओं, सैनिकों का सम्मान, सरोवर पूजन, वृक्ष पूजन, विशाल पर्यावरण चेतना रैलियों, पौधारोपण, घर-घर तुलसी हर घर तुलसी, नि:शुल्क पक्षी चिकित्सा शिविर, नेत्र दान, वस्त्र दान, रक्तदान जैसे अभियान चलाकर हर किसी को पर्यावरण के करीब लाने के सफल प्रयास करता रहता है।

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