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एक कहानी ओम जोशी:- और गिरीश कनार्ड से बात हो गई।

एक कहानी ओम जोशी:- और गिरीश कनार्ड से बात हो गई। हमेशा की तरह लॉक डाउन में सुबह नाश्ते के बाद मोबाइल फोन लेकर बैठा था। फेसबुक पर ...

एक कहानी ओम जोशी:- और गिरीश कनार्ड से बात हो गई।

हमेशा की तरह लॉक डाउन में सुबह नाश्ते के बाद मोबाइल फोन लेकर बैठा था। फेसबुक पर पोस्ट देखते देखते अचानक एक पोस्ट पर नजर रुक गई। वो पोस्ट बेंगलुरु की डॉ. उषारानी राव की थी जो कि गिरीश कनार्ड की जीवनी पर आधारित थी। जाना पहचाना चेहरा लगा तो स्क्रीन को स्क्रॉल करते करते अंगुली रुक गई और पोस्ट पढ़ने लगा। 
पढ़ने के बाद कमेन्ट में मैने लिखा "  मुझे भी इनसे मिलने का सौभाग्य मिला है।"  इतना टाइप करके मैं अगली पोस्ट देखने लगा। खाली समय मे सोशल मीडिया में कब दो घण्टे निकल गए पता ही नही चला। अब आंखें थक गई थी तो फोन को थोड़ी देर के लिए रख दिया। 
इन दिनों हमारी धर्मपत्नी हमेशा सुबह साढ़े ग्यारह बजे आयुर्वेदिक चाय पिलाती। तो उसने दालचीनी, अदरक और कालीमिर्च वाली ब्लैक टी मेज पर रखी और बोली लो सा चाय तैयार है। दोनों ने बैठकर चाय पी। कोरोना से बचाव का ये भी एक अच्छा नुस्खा था काढ़ा पीने का। 
ये पीने से थोड़ा आराम मिला। वो रसोई में चली गई खाना बनाने और मैं फिर लग गया मोबाइल पर।
फ़ेसबुक खोलने पर नोटिफिकेशन में लिखा हुआ संदेश प्राप्त हुआ कि Dr. Usharani rao replyed your comments.
मैंने उसपर क्लिक किया तो देखा कि उन्होंने मेरे उस टिप्पणी पर कि मुझे भी गिरीश कनार्ड से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है, उन्होंने लिखा कि तब तो आपके पास संस्मरण भी होंगे। 
" जी, बिल्कुल "। मैंने टाइप किया। मैं आगे बढ़ गया। पर शाम को मैंने सोचा कि संस्मरण तो वास्तव में लिखना ही चाहिए। फिर सोचा कि 31 साल पुरानी घटना को अब कैसे लिखा जाए। सबसे पहले घर मे उस समय की टिकिट ढूंढनी शुरू की जिससे वो नाटक देखा था जिसका आयोजन संगीत नाटक अकादमी ने करवाया था। तलाश शुरू हुई। पुरानी फाइलें ढूंढी। उनका एक एक पन्ना टटोला। अलमारी पूरी खंगाल ली। तीन दिन तक मेहनत की तब जाकर नेहरू शताब्दी नाट्य समारोह के आमंत्रण पत्र और ब्रोशर मिले।
फिर कहानी लिखने का मानस बनाया। शाम को छत पर जाकर एकदिन लॉक डाउन में लिखना शुरू कर ही दिया।


टिकिट टिकिट ... कन्डेक्टर बोला। मैंने कहा मंडी हाउस की एक देना। कंडेक्टर ने टिकिट देते हुए बोला ये लो टिकिट, जाओ पीछे की ओर बढो। डी टी सी की बस खचाखच भरी हुई थी, पांव रखने को जगह नही थी फिर भी दूसरे यात्रियों को धकेलते हुए मैं पीछे की ओर चला। एक सुरक्षित जगह देखकर खड़ा हो गया। न्यू राजधानी एन्क्लेव से आई टी ओ बस पहुंची ही थी कि बस में बैठे यात्रियों के बराबर और यात्री चढ़ गए। यात्रियों की इस उतरने चढ़ने की उहाँपोह में मुझे बैठने की एक सीट खाली होती दिखी। मैंने तेजी से वो सीट लपक ली और चैन की सांस लेकर बैठ गया। सुबह के समय ऑफिस टाइम होने से दिल्ली की बसों में बहुत भीड़ रहती है। सीट प्राप्त होना ही अपने आपको तीस मारखा समझने से कम नही माना जाता है।
बस तिलक ब्रिज होती हुई सुप्रीम कोर्ट स्टेण्ड पर पहुंची ही थी कि एक वृद्ध मेरे पास आकर गिड़गिड़ाया कि मेरी तबियत ठीक नही है, कृपया मुझे सीट दे दो, ये दिल्ली वालों का तो दिल  ही मर गया है, सबसे मैंने कहा पर कोई मुझे सीट नही दे रहा है। आप बाहर के लग रहे हो आप दया कर लो मुझपर। मैंने तुरन्त ही सीट उस बुजुर्ग के लिए खाली कर दी। खड़ा खड़ा सोचने लगा कि पता नही इस बुजुर्ग ने कैसे मुझे पहचान लिया कि मैं दिल्ली का रहने वाला नही हूँ , फिर सोचा कि मेरे हावभाव या बॉडी लैंग्वेज से पहचाना होगा। खैर, थोड़ी ही देर में मण्डी हाउस का बस स्टॉप आ गया और मैं बस से उतरकर सी सी आर टी पहुंचा। कार्यालय पहुचते ही दीप प्रज्ज्वलन और सर्वधर्म प्रार्थना हुई। आज प्रशिक्षण के प्रथम सत्र में श्री जीवनपाणि जी जो कि उस समय कत्थक केंद्र दिल्ली के निदेशक हुआ करते थे की वार्ता थी पारंपरिक नाटक विषय पर। वार्ता बहुत ही रोचक और ज्ञानवर्धक थी क्योंकि बीच बीच मे जीवनपाणि जी द्वारा लोक नाट्यों की विभिन्न मुद्राओं को हावभाव द्वारा समझाया जा रहा था। प्रथम सत्र के बाद चाय का ब्रेक हुआ।
दरअसल शिक्षक होने के नाते राजस्थान सरकार ने मुझे भारत सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्रालय अधीन दिल्ली स्थित सांस्कृतिक स्त्रोत एवम प्रशिक्षण केंद्र में 45 दिवसीय अनुस्थापन पाठ्यक्रम में भाग लेने के लिए भेजा था। इस नाते प्रशिक्षण ध्यानपूर्वक लेना ही था। 
आज ट्रेनिंग का शायद उन्नीसवां दिन था। लगातार वार्ताएं सुनते सुनते थोड़ी सी बोरियत हो रही थी। ब्रेक में चाय पीकर केंटीन से बाहर आया। परिसर में ही राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय ( N S D ) था, वहां पर कुछ भीड़भाड़ देखकर मन मे कौतूहल बढ़ा। पास जाकर देखा तो बहुत सारे कलाकार लोग नाट्य विद्यालय के दफ्तर में कल मंचित होने वाले नाटक अंधा युग को देखने के लिए फ्री पास लेने के लिए लालायित थे। मुझे भी ये जानकर खुशी हुई कि संगीत नाटक अकादमी द्वारा इन दिनों चल रहे नेहरू नाट्य समारोह में कल धर्मवीर भारती लिखित  और सत्यदेव दुबे निर्देशित नाटक अंधायुग का मंचन कमानी ऑडिटोरियम में होगा जिसमें मुख्य भूमिका में अभिनेता नसीरुद्दीन शाह और अमरीशपुरी है। दिल्ली में उस समय का सबसे आलीशान ऑडिटोरियम कमानी ही था। फिर क्या था, ये सब पता लगते ही मन को पर लग गए और प्ले देखने की प्रबल इच्छा जागृत हुई। उन्ही दिनों नसीरुद्दीन शाह की फ़िल्म त्रिदेव रिलीज हुई थी, जिसके एक गीत तिरछी टोपी वाले ओये आये के कारण नसीर ( नसीरुद्दीन शाह ) अपनी प्रसिद्धि की बुलंदियों पर थे। इन ख्वाबों के बीच चाय का ब्रेक पूरा हो चुका था पुनः क्लास में जाना था। क्लास में सांस्कृतिक नाट्य के बारे में जीवनपाणि जी ने अपनी बात को आगे बढ़ाया। स्लाइड शो के माध्यम से उनकी क्लास बड़ी रोचक लग रही थी। आजकल जिस तरह से पावर पॉइंट प्रेजेंटेशन किया जाता है वैसे ही उनदिनों 1989 में स्लाइड शो भी बड़ी बात हुआ करती थी। कुछ ही देर में लन्च ब्रेक हुआ। हमेशा की तरह सब साथियो के साथ खाना खाया। पूरे देश से हम लोग लगभग 80 की संख्या के  आसपास थे। खाने में राजमे की सब्जी बहुत स्वादिष्ट बनी थी। सबने चटकारे भरे। 
लंच के बाद दोपहर में आज प्रख्यात कुचिपुड़ी नृत्यांगना स्वप्नसुंदरी जी की क्लास थी। मन तो अगले दिन के नाटक को देखने के लिए फ्री पास आमंत्रण पत्र का जुगाड़ करने में व्यस्त था पर स्वप्नसुंदरी की क्लास का भी लालच था सो सोचा कि एकबार क्लास जॉइन कर ली जाए। 
क्लास में उन्होंने सैद्धान्तिक के साथ  नृत्य प्रदर्शन करके भी कुचिपुड़ी के बारे में हमे समझाया। बहुत ही आनंद आ रहा था हालांकि अंग्रेजी भाषा कहीं कहीं बाधक बन रही थी समझने में। डेढ़ घण्टे की क्लास पूरी हुई और टी ब्रेक के बाद डेढ़ घण्टे की क्लास बाकी थी। ब्रेक के बाद अगले डेढ़ घण्टा और भी रसपूर्ण रहा। स्वप्नसुंदरी जी ने कुचिपुड़ी के इतिहास से लेकर विभिन्न भाव भंगिमाओं और नृत्य मुद्राओं की रोचक जानकारी दी। क्लास के अंत मे संभागियों की ओर से तत्कालीन फील्ड ऑफिसर एलिज़ाबेथ आचार ने धन्यवाद ज्ञापित करने का अवसर मुझे प्रदान किया। सो मंच से मैंने उनका धन्यवाद ज्ञापित किया। सत्र के ठीक बाद उनसे व्यक्तिगत रूप से मिलना हुआ। राजस्थानी लोक नाट्यों पर उनसे  संक्षिप्त चर्चा हुई। अब लंच ब्रेक था। लंच के दौरान दिमाग मे एक ही बात घूम रही थी कि कल का अंधा युग कैसे देखा जाए। इस कालजयी नाटक को देखने का ये सुनहरा मौका था। इसलिए मैंने सी सी आर टी के तत्कालीन फील्ड ऑफिसर श्री गिरीश जोशी को मन की इच्छा बताई। उन्होंने बताया कि आमंत्रण पत्र तो मुझे भी आया है पर घर पर है, अन्यथा मैं आपको दे देता। उन्होंने उपनिदेशक श्रीमती के. रामदास से मिलने का रास्ता सुझाया। मैंने उनको धन्यवाद किया और बिना किसी झिझक के सीधे उपनिदेशक के चेम्बर में जा पहुंचा। हालांकि मन मे डर भी लग रहा था कि कहीं डांट न पड़ जाए। पर उन्होंने अच्छा रिस्पॉन्स देकर बैठने को कहा, पानी मंगवाया। मुझे कुछ तसल्ली मिली। मैंने अपने मन की इच्छा जताई कि मुझे अंधा युग प्ले देखना है तो उन्होंने आश्चर्य व्यक्त किया कि इतनी दूर न्यू राजधानी एन्क्लेव, जमना पर से छुट्टी के दिन केवल प्ले देखने के लिए आ जाओगे मंडी हाउस ?  मैंने कहा हां जरूर आऊंगा। इस पर उन्होंने कहा " चलो कल रविवार है तो इस प्ले का आनंद लो, ये लो ये मेरा पास है , इसे लेकर जाना। कमानी में एंट्री मिल जाएगी।"  मुझे मेरी सफलता और उनकी दरियादिली पर विश्वास नही हो रहा था। 
मैं उनको धन्यवाद देता हुआ बाहर आया। अब क्या था बस कल का सूरज कब उगे यही इंतजार में था। छुट्टी के बाद होस्टल के लिए 381 नम्बर की बस पकड़ी। खचाखच भरी बस में सीट मिलना तो आसमान के तारे तोड़ लाने जैसा होता है। सो खड़े खड़े एक घण्टे का सफर किया। इस दौरान शक्करपुर स्टॉप पर बस में एक व्यक्ति को लोगों ने एक जने का जेब काटते हुए पकड़ लिया और उसकी पिटाई शुरू कर दी। बस में बहुत शोर होने लगा। मन मे डर भी था कि कहीं अपनी जेब भी साफ न हो जाये। सो संभलकर खड़ा हुआ जाए। कोई भी यात्री चिपक कर खड़ा होता तो उसे सीधा खड़ा होने की मैं बार बार हिदायत देता रहा। आखिर कड़कड़डूमा स्टॉप आया। मैं बस से उतर गया। वहां मार्किट में कुछ चीजें लेनी थी सो खरीददारी कर होस्टल आया। थोड़ी देर में खाना खाया। दोस्तों से कुछ गप्प गोष्ठी की और सो गया। 
अगले दिन सुबह 6 बजे उठा। 10 सितंबर 1989 का दिन था। तैयार होकर नाश्ता किया। होस्टल से  कुछ दोस्तों के साथ बाहर आया। दोस्तों के साथ आधा दिन दिल्ली घूमने का कार्यक्रम बनाया फिर 3 बजे प्ले देखना था मुझे। 
उन दिनों छुट्टी के दिन दिल्ली की डी टी सी बसों में 25 रुपये का फ्री पास बनता था जो एक दिन के लिए मान्य था। उस पास से किसी बस में जितनी बार चाहो यात्रा कर सकते थे। तो हम सबने वो पास बनाया और लाल किला चले गए। लालकिला देखकर इंडिया गेट आ गए। बोट क्लब देखने के बाद कनॉट प्लेस के एक रेस्टोरेंट में खाना खाया तब तक दोपहर के दो बज चुके थे। मैं दोस्तों से विदा ले बस से मंडी हाउस आ गया। कमानी ऑडिटोरियम पहुंचा तो पता चला कि हॉल पूरा भर चुका है और प्रवेश बन्द कर दिया गया है। मन बहुत निराश हुआ कि काश घूमने नही गया होता और दो घण्टे पहले ही यहां आ जाता तो प्रवेश मिल जाता। तीन बजते ही शो शुरू हो गया। हम कोई अस्सी नब्बे लोग बाहर खड़े इंतजार कर रहे थे कि काश हमे अंदर जाने दिया जाए। दस पन्द्रह मिनट गुजरने के बाद हमने देखा कि कुछ लोग अंदर से बाहर आ गए और घर चले गए। ये क्रम चालू रहा। हमे खुशी भी हो रही थी कि इनकी जगह हमे प्रवेश मिल जाएगा और गुस्सा भी आ रहा था  कि नाटक नही समझने वालों को कैसे आमंत्रण दिए गए जो कि अब वापिस बाहर आ रहे थे। हमारी सब्र का बांध टूट रहा था। हमने वहाँ तैनात सुरक्षा कर्मियों से नोकझोक की। हमे प्रवेश दिलाने की जिद पर अड़ गए हम। एकदूसरे अनजान साथियों का समर्थन मिल जाने से मुझे बहुत जोश आ रहा था। मैं वहां किसी भी व्यक्ति से परिचित नही था। पर अंधायुग देखने का सपना अपने चरम पर था। मैंने वहां पर नारे लगाने शुरू कर दिए और जमीन पर बैठके धरना शुरू कर दिया। कुछ अधिकारी आये और पुलिस बुला ली। पुलिस की गाड़ी आई और सबसे पहले मुझे पकड़कर गाड़ी में ले जाने लगी। देखते ही देखते पचास सांठ लोगो को पकड़ लिया जो हॉल के अंदर जाने की जिद कर रहे थे। वहीं पर कमानी के गेट पर भगदड़ मच गई। एक पुलिस का बड़ा अधिकारी आया और मुझे शांत करने लगा। तब तक मैं उन अस्सी नब्बे कला रसिकों का लीडर बन चुका था। 
मैंने उस पुलिस अधिकारी को निवेदन किया कि एकबार हमें संगीत नाटक अकादमी के अध्यक्ष से मिलवा दो उसके बाद आप चाहो तो हमे पकड़कर ले जाना। पुलिस अधकारी ने हमारी बात मान ली। हमें शांत रहने के निर्देश दिए और वो अंदर गया। कुछ ही देर में वो पुलिस अधिकारी एक अदम्य व्यक्तित्व वाले इंसान के साथ बाहर आये। उन्हें देखते ही मैंने उन्हें पहचान लिया कि ये फ़िल्म स्टार गिरीश कनार्ड है। वो हमारे नजदीक आये। हमने पूर्ण शिष्टता से उनका अभिवादन किया। वो मुस्कराये और हमारी समस्या पूछी। उनसे बात करने में सब लोग डर के मारे पीछे हट गए। मैंने सोचा भगवान ने ये मुझे अच्छा मौका दिया है इनसे बात करने का। मैंने मौके की नज़ाकत देखते हुए तपाक से अपनी बात रखी।
" सर, हम लोग राजस्थान के सुदूर बाड़मेर जिले से आये हैं। हमको ये नाटक देखना है, प्लीज सर आप हम पर मेहरबानी कीजिये। हम लोग कलाकार हैं, हमे बहुत शौक है इस तरह के आयोजनों का।"  एक ही सांस में अपनी बात रख दी मैंने। 
श्री गिरीश कर्नाड बोले - " हॉल में पांव रखने को जगह नही है। सब सीटें फुल हो चुकी है।"  
मैंने तुरन्त ही कहा कि सर हम खड़े खड़े प्ले देख लेख लेंगे, हमे कुर्सी की जरूरत नही। इतने में एक पास खड़े अन्य व्यक्ति ने सुझाव दिया कि सर कुर्सियों के दोनों विंगों के बीच की जो गेलेरी है वहीं पर हम नीचे जमीन पर बैठ जाएंगे। इस पर उन्होंने कहा कि आप लोग वहां शोर करोगे जिससे हमारे मंच में कलाकार डिस्टर्ब हो जाएंगे। हमने उन्हें हाथ जोड़कर आश्वस्त किया कि हम बिल्कुल ही बात नही करेंगे और चुपचाप प्ले देखेंगे। बस आप हमें प्रवेश की अनुमति दें सर आपका अहसान हम जिंदगी भर नही भूलेंगे।
कुछ क्षण की चुप्पी तोड़ते हुए उन्होंने पुलिस अधिकारी को हमें छोड़ देने का कहा और हमे शोर न करने की शर्त पर हॉल में जाकर गेलेरी में बैठने की अनुमति दे दी।
हम सब लोगों की खुशी का ठिकाना नही था। हम पुलिस की गिरफ्त से छूटकर कमानी में पहुंचे। अंदर हॉल में पहुंचते ही देखा कि एशिया के सबसे अच्छे हॉल में मंच पर नसीरुद्दीन शाह अश्वथामा के रूप में कुछ संवाद बोल रहे थे और हॉल में एकदम पिन्ड्रॉप साइलेंट था। 1950 के आसपास धर्मवीर भारती लिखित इस नाटक का हम शो देख रहे थे वो भी भारत के महान कलाकारों द्वारा अभिनीत। 
थोड़ी ही देर में अमरीशपुरी एक सन्यासी के रूप में मंच पर आये और अश्वत्थामा को युद्ध और विनाश टालने का आव्हान किया। दोनों में आमने सामने सधे हुए संवाद होने लगे।
फूल लेंथ प्ले था। काफी देर बड़े बड़े कलाकारों के अभिनय का रसास्वादन किया। कलाकारों के संवाद, महाभारत के युद्ध का कथानक, वेषभूषा, मेकअप, लाइटिंग आदि इतनी सधी हुई थी कि कहीँ कुछ सोचने का अवसर ही नही मिला और तन्मयता से नाटक देखा। लगभग ढाई घण्टे बाद हॉल से बाहर आये। बाहर आकर इतनी सुखद अनुभूति हुई मानो आसमान के तारे तोड़ लाया हूँ।
खैर, बाहर आकर भगवानदास रोड़ पर एन एस डी से सटे चाय के केबिन वाले से चाय ली और हमेशा की तरह फुटपाथ पर बैठकर चाय की चुस्की ली ही थी कि अलका आमीन मिल गई। उनसे अभवादन हुआ और उनके लिए भी चाय ले आया। तब तक राजेश बब्बर, बेगराज गौड़, गोविंद पांडे और सतीश आदि रंगकर्मी साथी आ गए। इन सबसे अंधायुग पर चर्चा हुई। सबने खूब सराहा। दरअसल इन सब रंगकर्मी साथियों के साथ मेरी एक नाटक रिहर्सल इन दिनों चल रही थी जो कि हम कार्यालय समय के बाद ललित कला अकादमी गेस्ट हाउस के पास लॉन में करते थे। दोस्तों से गप गोष्ठी का बाद बस पकड़ी और होस्टल आ गया। रात के खाने के बाद बिस्तर पर बैठे बैठे आज के सुनहरे अवसर के बारे में सोचने लगा और मन ही मन भगवान को धन्यवाद दिया। सोचते सोचते आज दिनभर की भागदौड़ के कारण नींद ने कब आगोश में ले लिया पता ही नही चला।
दूसरे दिन प्रशिक्षण में सी सी आर टी पहुंचा। नेहरू शताब्दी नाट्य समारोह में संगीत नाटक अकादमी ने जितने भी नाटक करवाए उसके दूसरे दिन प्रातः साढ़े दस बजे उस नाटक की समीक्षा रखी जाती थी जिसमे निर्देशक, अभिनेता, ड्रेस डिजाइनर, मेकअप मेन, लाइटमैन, आयोजकों के अलावा दर्शक भी भाग लेते थे। मेरा मन उस समीक्षा बैठक में भाग लेने का हो रहा था ताकि उन अभिनेताओं को करीब से देख भी सकूँ और कुछ सीखने को भी मिले। अब मुद्दा यह था कि क्लास से कैसे छुट्टी मिले। आज प्रातःकालीन सत्र में भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण विभाग के सुपरिडेण्टेन्ट डब्ल्यू एस सिद्दीकी की वार्ता भारतीय इस्लामिक कला पर थी। वार्ता भी बड़ी महत्वपूर्ण विषय पर और देश के एक बड़े अधिकारी द्वारा होनी थी। उनसे छुट्टी मांगने की हिम्मत नही हो रही थी। बार बार कोर्स डायरेक्टर के. रामदास के पास जाना भी उचित नही लग रहा था। जैसे तैसे साहस जुटाया और सिद्दीकी साहब से एक घण्टे की छुट्टी मांगी। उनको मैंने नाट्य समीक्षा बैठक का स्पष्ट बता दिया। उन्होंने तपाक से बोल दिया - " आपकी जिस विषय मे रुचि हो उसमे जा सकते हो "। मैं खुश होकर सीधे रविन्द्र भवन गया जहां पर समीक्षा बैठक थी। मुझे पीछे की ओर बैठने का स्थान मिला। बैठक शुरू हुई। सबसे पहले नाटक के निर्देशक श्री सत्यदेव दुबे ने सभी का आभार व्यक्त किया और सबसे सुझाव मांगे। लोगों ने अपने अपने सुझाव दिए। खूब तारीफ हुई कल के प्ले की। हालांकि बैठक में अमरीशपुरी और नसीरूदीन शाह नही थे। फिर भी नाटक के सभी पक्षों पर विस्तृत चर्चा हुई। मैं ध्यानपूर्वक सब बातें सुनता रहा और नोट करता रहा। अंत मे निर्देशक श्री दुबे ने अपनी बात रखी और सबको संतुष्ट किया। चाय के साथ समीक्षा बैठक पूरी हुई। मैं तुरन्त ही कॉपरनिक्स रोड़ क्रॉस करके सी सी आर टी पहुंचा और ट्रेनिंग का सत्र जॉइन किया।

मेरी इस जीत के बाद मुझे लग रहा था कि आम आदमी भी बड़े बड़े आयोजनों में शामिल हो सकता है, बस थोड़ी सी हिम्मत और धैर्य की जरूरत होती है।


लेखक : ओम जोशी
राष्ट्रपति पुरुस्कृत शिक्षक
जोशियों का निचला वास, बालार्क मन्दिर के पास 
बाड़मेर ( राजस्थान) 344001

ईमेल : om5667joshi@gmail.com

Mob. 9460086907

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