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कनीना में लगे कैंप में पशुपालकों को सरकार की विभिन्न योजनाओं के बारे में दी जानकारी।

कनीना में लगे कैंप में पशुपालकों को सरकार की विभिन्न योजनाओं के बारे में दी जानकारी। @ इंद्रजीत शर्मा महेंद्रगढ़/कनीना। कनीना स्थित पशु अस्पत...

कनीना में लगे कैंप में पशुपालकों को सरकार की विभिन्न योजनाओं के बारे में दी जानकारी।


@ इंद्रजीत शर्मा
महेंद्रगढ़/कनीना। कनीना स्थित पशु अस्पताल में जिलाधिकारीयों ने एएससीएडी कैंप में किसानों को विभाग की विभिन्न गतिविधियों व योजनाओं के बारे में विस्तारपूर्वक जानकारी दी गई। इस कैंप में मुख्य अतिथि एसडीओ डॉ. ईश्वर नाफरियां विशिष्ट अतिथि राजकुमार थे। कार्यक्रम की अध्यक्षता डॉक्टर लालचंद ने की। इस कैंप में कनीना, करीरा, भड़फ, कोटिया, ककराला, कपूरी, चेलावास आदि गांवों के लोगों ने हिस्सा लिया। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि ईश्वर ने किसानों को संबोधित करते हुए कहा कि सरकार की विभिन्न योजनाएं पशुपालकों के लिए चली हुई है जिसमें मिनी डेरी का एक प्रोजेक्ट चला हुआ है। इस प्रोजेक्ट में 11 दिन की ट्रेनिंग दी जाती है जिसमें 2 भैंस से लेकर 50 दुधारू पशुओं तक का लोन प्राप्त किया जा सकता है। पशुओं की यूनिट कोष  88 हजार रूपए तक है। इस योजना के तहत पशु पालक पशु पालकर अच्छा मुनाफा कमा सकते हैं। दूसरी योजना भेड़ बकरी पालने की है। इस योजना के तहत सामान्य, एससी, एसपी के लोग भेड़ बकरियां पाल सकते हैं। इस योजना में भेड़ बकरियां सरकार द्वारा दी जाती है इसमें बीस बकरी व एक मेंढा सरकार देती है। इस योजना के तहत पशुपालक को एक वर्ष में दस बकरी व एक मेंढा सरकार को वापस देने होते हैं। इस योजना के तहत पशुपालक से सरकार 70000 का एक चेक एडवांस में लेती है। किसी भी कारण से अगर पशुपालक
 दस बकरी व एक मेंढा 1 वर्ष में जमा नहीं करवाता है तो एडवांस में दिये गए चेक को कैश करवा लिया जाता है। इस योजना की ट्रेनिंग हिसार में 21 दिन की होती है। जिसमें रहने खाने का खर्चा सरकार के द्वारा दिया जाता है। तीसरी योजना सूअर पालन की है। इस योजना में सूअर पालन करने वाले व्यक्ति को ऑनलाइन सरल पोर्टल पर फॉर्म जमा करवाना होता है। जिसमें डिपार्टमेंट की तरफ से प्रोसेस करके बैंक में भेज दिया जाता है। अगर व्यक्ति सरकार की सभी शर्तों को पूरा करता है तो उसको 6 सूअर मादा व एक सूअर नर के लिए 50,000 रुपए दिए जाते हैं। इसी योजना में 12 सूअर मादा व दो सूअर नर के लिए एक लाख रुपए दिए जाते हैं।
विशिष्ट अतिथि राजकुमार ने पशुओं में होने वाले रोगों के उपचार के बारे में पशुपालकों को अवगत करवाया है। उन्होंने कहा कि पशुपालक अपने घरों में रखी जड़ी बूटी या पंसारी के पास उपलब्ध जड़ी बूटियों से अपने पशुओं का इलाज कर सकते हैं। डॉक्टर नरेंद्र बोहरा ने पशुओं को होने वाला रोग गलघोटू के बारे में बताते हुए कहा कि बरसात में अकसर पशु (गाय-भैंस) गलघोंटू रोग की चपेट में आ जाते हैं। पशुओं में लगने वाला यह जीवाणु जनित रोग संक्रमित है और तेजी से फैलता है। अगर लक्षण का पता लगने के बाद पशुओं का शीघ्र इलाज शुरू न किया जाए तो 24 घंटे के भीतर पशु की मौत भी हो जाती है। यह रोग 'पास्चुरेला मल्टोसीडा' नामक जीवाणु के संक्रमण से होता है। यह जीवाणु सांस नली में तंत्र के ऊपरी भाग में मौजूद होता है। मौसम परिवर्तन के कारण पशु मुख खुर (गलघोंटू) रोग की चपेट में आ जाता है। इस के लक्षण में विशेष रुप से पशु को अचानक तेज बुखार हो जाता है। बुखार की चपेट में आने से रोगी पशु सुस्त रहने लगता है तथा खाना-पीना छोड़ देता है। पशु की आंखें भी लाल रहने लगती हैं। उसे सांस लेने में भी दिक्कत होती है। उसके मुंह से लार गिरने लगती है। नाक से स्राव बहना तथा गर्दन व छाती पर दर्द के साथ सोजिश आना मुख्य लक्षण है। इस रोग के रोकथाम के लिए पशुओं को हर वर्ष बरसात के इस मौसम में गलघोंटू रोग का टीका लगवाएं। इसके साथ ही बीमार पशु को अन्य पशुओं से दूर रखें क्योंकि यह तेजी से फैलने वाली जानलेवा बीमारी है। जिस जगह पर पशु की मृत्यु हुई हो वहां कीटाणुनाशक दवाइओं का छिड़काव किया जाए। पशुओं को बांधने वाले स्थान को स्वच्छ रखें तथा रोग की संभावना होने पर तुरंत पशु चिकित्सकों से संपर्क करें। पशुओं में लगने वाला दूसरा बड़ा रोग है चेचक या माता। 
यह भी विषाणुओं से फैलने वाला एक संक्रामक रोग है जो आमतौर से गायों तथा उसकी संतान में होता है। कभी - कभी गायों के साथ - साथ भैंसों में भी यह रोग देखा गया है। इस रोग में पशु की मृत्यु दर तो कम होती है परंतु पशु की कार्यक्षमता एवं दुग्ध उत्पादन में अत्यधिक कमी आती है। यह रोग भी आमतौर से एक पशु से दुसरे पशु को लगता है। दूध दूहने वाले ग्वालों द्वारा भी यह रोग एक गाँव से दुसरे गाँव में फैलता है। इस रोग से बचाव हेतु वर्ष में एक बार नवम्बर - दिसम्बर माह में टिका अवश्य लगवाना चाहिए। खुर और मुख संबंधी बीमारियाँ खुर और मुख की बीमारियां, खासकर फटे खुर वाले पशुओं में बहुत अधिक मात्रा में पाई जाती है। जिनमें शामिल है भैंस, भेड़, बकरी व सूअर। ये बीमारी भारत में काफी पाई जाती है व इसके चलते किसानों को काफी अधिक आर्थिक हानि उठानी पड़ती है। बकरियों में पीपीआर रोग बहुत जल्दी फैलता है। पीपीआर रोग विषाणु जनित एक रोग है, जिससे बकरियों में अत्यधिक मृत्यु होती है। इसलिए पीपीआर रोग को बकरियों में महामारी या बकरी प्लेग के नाम से भी जाना जाता है। शुरुआती दौर में बकरियों में बुखार, जुकाम व डायरिया की शिकायत होती है। इसके बाद नाक व थूथन में छाले पड़ना शुरू हो जाते हैं। बकरी व भेड़ खाना-पीना छोड़ देती है। देर से इलाज करने पर कोई दवा कारगर साबित नहीं होती। डॉक्टर लालचंद ने पशुपालकों को पशु किसान क्रेडिट कार्ड योजना के बारे में बताया उन्होंने कहा कि पूरे जिले में कनीना ब्लॉक के तकरीबन 75 किसानों को पशु किसान कार्ड बनाया गया है। सरकार की दुग्ध प्रतियोगिता योजना के तहत 18 लीटर से 22 लीटर तक दूध देने वाली भैंस को 15 हजार रूपए व 22 लीटर से ऊपर दूध देने वाली भैंस को 25000 रुपए इनाम स्वरूप दिया जाता है। वही गोवंश वर्धन योजना के तहत 8 किलो से 12 किलो के बीच में सफेद हरियाणवी नस्ल की गाय को 10000 रुपए 12 लीटर से ऊपर दूध देने वाली गाय को 15000 रुपए व 18 लीटर से ऊपर दूध देने वाली गाय को 20000 रुपए इनाम में दिए जाते हैं । इस कैंप में डॉक्टर ईश्वर नाफरिया, राजकुमार, डॉ. लालचंद, डॉक्टर नरेंद्र बोहरा, डॉ प्रवीण यादव, जसवीर, उमेद सिंह, पंकज, संदीप, विक्रम आदि ने अपने विचार किसानों के सामने रखें।

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