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बाड़मेर के किसान का कमाल, मख़मली रेत के धोरों पर लगाई केसर की क्यारी।

बाड़मेर के किसान का कमाल, मख़मली रेत के धोरों पर लगाई केसर की क्यारी। इरादे नेक व हौसले बुलन्द हो तो असम्भव भी सम्भव हो जाता है। यह सच्च कर दि...

बाड़मेर के किसान का कमाल, मख़मली रेत के धोरों पर लगाई केसर की क्यारी।



इरादे नेक व हौसले बुलन्द हो तो असम्भव भी सम्भव हो जाता है। यह सच्च कर दिखाया है थार मरुस्थल के सरहदी जिले बाड़मेर के धोरों के बीच बसे एक किसान बाबूलाल ने। बाबूलाल खुद  कम पढ़ा - लिखा होने के बावजूद उन्होंने केसर की फसल बुवाई की और इस रेगिस्तानी इलाके में केसर की खेती को संभव कर दिखाया। बाबूलाल बताते हैं कि उन्होंने इंटरनेट का सहारा लेकर केसर की खेती से जुड़ी मौसम से लेकर मिट्टी तक की पूरी जानकारी जुटाई। आज इस किसान के खेत में 400 पौधों पर केसर महक रही है।

विडियो में देखें धोरों में केसर की खेती को


केसर की खेती जन्नत ए हिंदुस्तान की शान है और इसकी महक से देश ही नही सात समंदर पार तक के लोग कायल है। यही केसर अब रेतीले बाड़मेर के एक खेत का नया ठिकाना नजर आ रही है। भारत पाकिस्तान सीमा पर बसे बाड़मेर के चोखला गाँव के किसान बाबूलाल ने रेत के धोरों में इसे लगाकर प्रगतिशील किसान के रूप में पहचान कायम की है।बाबूलाल के इस कारनामे से आसपास के किसान हैरान हैं और इसके बारे में जानकारी लेने आ रहे है। पश्चिमी राजस्थान के रेतीले इलाके के चौखला ग्राम पंचायत में कृषि कुँए होने के बाद इलाका आबाद हुआ है। अब कुछ मेहनती किसान रेतीली धोरों पर फसलों के साथ फल की पैदावार ले रहे है। अब यहाँ किसान नवाचारों से हर किसी को हैरत में डाल रहे है। इनमें बाबूलाल ने दो कदम आगे बढ़ाते हुए खुद के खेत में केसर की खेती कर डाली बल्कि दुनियां को भी हैरत में डाल दिया कि इरादे मजबूत और दिल में कुछ करने का मन हो तो मेहनत करके कुछ भी हासिल किया जा सकता है। किसान बाबूलाल ने बताया कि गत वर्ष उन्होंने अपने रिश्तेदार के खेत में केसर के पौधे देखे, तो खुद ने भी खेती करने का मानस बनाया। रिश्तेदार से केसर की खेती करने की सारी विधि समझी। फिर पिछले साल अगस्त में एक बीघा भूमि में गाय के गोबर की खाद डालकर जमीन को तैयार की। अक्टूबर के पहले हफ्ते में केसर का रोपण किया। इस साल फरवरी में केसर के पौधे पूरी तरह तैयार हो चुके और इन पर फूल आ गए। मार्च के पहले हफ्ते में पूरे परिवार ने मिलकर केसर के फूलों को चुनना शुरू किया। बाबूलाल ने बताया कि अभी करीब 10 से 15 किलो केसर लगी हुई है। उन्होंने बताया कि केसर का पौधा 6 महीने में तैयार हो जाता है। एक बीघा भूमि में एक किलो बीज का रोपण किया। इसके अलावा एक लाख रुपए खाद इत्यादि पर भी खर्च हुए। केसर की खेती के इस कारनामे में बाबूलाल की पत्नी लहरों देवी बराबर की हिस्सेदार है। वह बताती है कि कड़ी मेहनत और लगन सफल हुई।

आज लोगो के लिए अचरज बन चुके बाबूलाल ने बताया कि धोरों की धरती में केसर की खेती के लिए गोबर की खाद श्रेष्ठ है। पौधों को धूप से बचाना जरूरी है। पांच माह बाद केसर के पौधे पर डोडे लगने शुरू हो जाते हैं और उनमें केसर के फूल लगते हैं, जिन पर पत्तियां लगती हैं। ये 2 - 3 दिन में पीले से लाल होनी शुरू हो जाती हैं। लाल होने पर इन्हें 48 घंटे के अंदर चुनना जरूरी होता है, अन्यथा ये खराब हो जाती हैं।

एक तरफ जहाँ रेत के दरिया में बरसों तक अभाव और अकाल को ही स्थाई निवासी माना जाता था लेकिन बदलते परिवेश और यहाँ के खेतिहारो की मेहनत से अब यहाँ नई इबारत लिख दी है।

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