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ईद विशेष: कहानी - माँ के स्वर्गवास से पहले तक मीठी सेवइँया..!

ईद विशेष: कहानी - माँ के स्वर्गवास से पहले तक मीठी सेवइँया..! माँ के स्वर्गवास से पहले तक घर में कभी भी बाजार से सिवाईयां नहीं आई थी । हमारे...

ईद विशेष: कहानी - माँ के स्वर्गवास से पहले तक मीठी सेवइँया..!




माँ के स्वर्गवास से पहले तक घर में कभी भी बाजार से सिवाईयां नहीं आई थी । हमारे यहां दीपावली का पर्व एकादशी से शुरु होता है उसी दिन से घर में शाम को सिवाईयां और दाल परोसी जाती है। 
सप्तमी अष्टमी के लगभग घर में सिवाईयां बनाने का काम शुरु हो जाता था। हाथ से घूमने वाली एक मशीन होती थी जिसको चारपाई पर बांध कर सेट किया जाता था और हैंडल को घुमाने का काम मैं करता था। माँ उसमें गेहूं के आटे को तैयार करके मशीन में डालती रहती थी। मैं हैंडिल घुमा कर के सिवाईयां तैयार करता था। चारपाई पर बैठकर सिवाईयां बनाने के लिए हैंडल घुमाने का काम सामान्यतः लड़के ही करते थे क्योंकि इस कार्य को करना आसान नही होता था। माँ मशीन के निचले हिस्से से निकली गीली  सिवइयों को नीचे से लेकर कपड़े पर रख देती थी। लगभग 3 - 4 घंटे इस काम  में लग जाते थे। सिवईयां इतनी पर्याप्त मात्रा  में हो जाती थी कि तीन चार दिन तक घर में आराम से पूरा परिवार खा सकें। इस बार पांच किलो गेंहू के आटे की सिवाईयां मैंने और माँ ने मिलकर तैयार की थी। हालांकि कुछ देर मुझे आराम देने के लिए मेरे भाई ने भी मशीन का हैंडिल घुमाया था। एकादशी और द्वादशी को घर में सिवाईयां दाल बनी और हमने उसमें घी  और चीनी डालकर खूब चाव से खाई। अगले दिन धनतेरस थी सुबह से ही मन में उमंग थी। दीपावली का मुख्य पर्व धनतेरस से ही शुरु होता है। घर में सब प्रातःकाल जल्दी उठ कर नहा धोकर तैयार हो गए। माँ  उस दिन अभी तक नहाई  नहीं थी। मैंने कारण पूछा तो बोली कि तबियत ठीक नही है। भाई तत्काल टेक्सी लाया और अस्पताल ले गया। डॉक्टर ने उसे अस्पताल में भर्ती करने को कहा। हालांकि धनतेरस के बड़ा दिन होने  के बावजूद दुखी मन से माँ को अस्पताल में भर्ती कराया। दोपहर तक पेटदर्द में कुछ राहत थी पर शाम को तबीयत ज्यादा बिगड़ गई और डॉक्टर ने उसे किसी बड़े अस्पताल ले जाने की सलाह दी। एम्बुलेंस की व्यवस्था की और पास के बड़े शहर जाने की तैयारी की। परिवारजन माँ के साथ एम्बुलेंस में रवाना हुए एक घण्टा हुआ होगा कि माँ ने अंतिम सांस ली। कुछ समझ मे नही आ रहा था फिर भी हम उसे बड़े शहर ले गए जहाँ पर डॉक्टर ने उसे मृत घोषित कर दिया। 
भारी मन से घर वापिस आए। दूसरे दिन सुबह सब लौकिक कार्य किया और ये दीपावली हमारे परिवार के लिए भारी साबित हुई।
दीपावली बीते कुछ दिन हुए थे। पूरा परिवार शोक में था। किसी तरह सामान्य  जीवन पटरी पर आया। शोक कुछ कम हुआ और रूटीन का जीवन हम सब जीने लगे। 
एक दिन कार्यस्थल पर काम कर रहा था कि नई दिल्ली से फोन और मेल आया कि आगामी 5 तारीख को एक राष्ट्रीय सेमिनार में मुझे गंगटोक ( सिक्किम ) पहुंचना है। मैं तैयारियों में जुट गया।  दो-चार दिन में तैयारियां पूरी हो गई और गंगटोक जाने के लिए नई दिल्ली से राजधानी एक्सप्रेस में टिकट भी कंफर्म हो गया। इस बीच मेरी एक पुरानी मित्र शकीला का फोन आया। दरअसल मेरी फेसबुक की पोस्ट से उसे ज्ञात हुआ कि मेरी मां का स्वर्गवास हो गया था तो उसने संवेदना व्यक्त करने हेतु फोन किया। इस बीच मुझे याद आ गया कि गंगटोक जाते समय किशनगंज रास्ते में पड़ता है। शकीला किशनगंज में रहती थी । फोन की बातचीत में मैं उसे बता नहीं पाया कि मैं गंगटोक जा रहा हूं। बाद में याद आया कि मुझे उसको बताना चाहिए था। खैर,  उन दिनों रमजान का महीना चल रहा था और ईद में यही कोई पांच सात दिन बाकी थे। मुझे अगले दिन सिक्किम के लिए निकलना था। सोचा कि शकीला के लिए कुछ गिफ्ट ले जाऊं। हालांकि राजधानी एक्सप्रेस किशनगंज में मात्र 5 मिनट रुकती थी और अगला स्टेशन न्यू जलपाईगुड़ी था जो कि पश्चिम बंगाल में पडता है और मुझे वहीं पर उतरना था।  किशनगंज से न्यू जलपाईगुड़ी का रास्ता यही कोई दो-तीन घंटे का था। दिमाग ने  सोचना शुरु किया कि उसे रेलवे स्टेशन पर फोन करके बुला लिया जाए और ईद की मुबारकबाद दे दी जाए। जल्दबाजी में गिफ्ट के लिए कुछ बाजार से लाना सूझ नहीं रहा था इतने में याद आया कि मेरी मां के हाथ से बनाई हुई कच्ची सिवाईयां घर में पड़ी है। मैंने आव देखा न ताव।  श्रीमती जी को कह दिया कि कुछ सिवइँया एक पैकेट में पैक कर दे तो शकीला को मां के हाथ की सवैया ईद के मौके पर गिफ्ट में देंगे। श्रीमती को भी यह आईडिया पसंद आया और उसने  पैक कर दी।
अगले दिन मेरी रवानगी थी। नई दिल्ली से राजधानी एक्सप्रेस में सुबह 9:30 बजे प्रस्थान किया। गाड़ी में बैठने के बाद शकीला को फोन लगाया और हमारी एक सूक्ष्म मुलाकात होने वाली है यह बात उसे बता कर मैंने आश्चर्य में डाल दिया। उसने खुशी-खुशी हां कह दिया कि मैं स्टेशन पर आऊंगी। दूसरे दिन शाम को लगभग 4:00 बजे रेलगाड़ी किशनगंज पहुंची।  मैंने उसे पहले से ही मेरा कोच नंबर और गाड़ी संख्या बता दी थी वो निश्चित स्थान पर अपनी दो बेटियों के साथ मौजूद थी। मैं नीचे उतरा और उसे ईद की मुबारकबाद दी और मैंने मेरी मां के हाथ की बनी सिवाईयां उसे उपहार में दी।  उसकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा उसने कहा दोस्त मैं इसे पका कर आपको जरूर खिलाऊंगी पर उस समय यह संभव नहीं था। सो मैंने उसे कह दिया कि पकाकर घी और चीनी के साथ अपने परिवार को खिलाए तो मुझे खुशी होगी। वो स्टेशन पर अपनी बेटियों के साथ आई थी और मेरे लिए मिठाइयां फल और चॉकलेट भी लाई थी। मेरे मना करने के बावजूद उसने मुझे इतनी सारी चीजें गिफ्ट की। बेटियां साथ लाने का मुझे कोई पूर्व में आइडिया नही था सो मैं उनके लिए कुछ साथ मे नही ले गया था। आनन फानन में मैंने कुछ पैसे दोनो परियों के हाथ मे पकड़ा दिए। बहुत प्यारी परियां थी। तुतला तुतलाकर बोलने की कोशिश कर रही थी।
कुछ बातें हुई इतने में रेलगाड़ी ने सिटी बजा दी। हम एक दूसरे के हालचाल पूछने में व्यस्त थे। एक दूसरे के यहां कुछ दिन परिवार के साथ आने के लिए दोनों  परस्पर आमंत्रण दे रहे थे तब तक गाड़ी चलनी शुरू हो गई और मैं दौड़कर गाड़ी में बैठ गया। हमारे पुरानी मुलाकातों की यादें मेरे दिलो-दिमाग में घूमने लगी। 4 साल पहले लखनऊ में आयोजित एक सेमिनार में उससे मुलाकात हुई थी तब  वह अविवाहित थी। हालांकि अगले महीने ही उसका निकाह होने वाला था। उसने मुझे निकाह में आमंत्रित भी किया था पर अधिक दूरी और व्यस्तता के कारण मैं जा नही सका था। लखनऊ सेमिनार के दौरान एकदिन शाम को हम बड़ा इमामबाड़ा देखने गए तो उसने पास की एक चिकनक्राफ्ट की दुकान से एक पिंक कुर्ता खरीदा था। यही कुर्ता आज उसने पहन रखा था। वो एक अच्छी चित्रकार थी और क्राफ्ट का काम भी अच्छे  से जानती थी। 
इस बार 5 मिनट की स्टेशन पर हुई इस  मुलाकात से वह बहुत खुश हुई। उसने  बाद में मुझे लिखा कि इस तरह दोस्तों से अचानक हुई मुलाकातों से जीवन मे नई स्फूर्ति आती है और मां के हाथ की बनी सिवइयों से रिश्तों में घी और शक्कर जैसी मिठास। मैं उसके इन शब्दों से गदगद था और आंखों में खुशी के आंसू निकल रहे थे।
काश। ऐसी ईद बार बार जीवन मे आए।




लेखक: ओम जोशी
राष्ट्रपति पुरूस्कृत
बाड़मेर ( राजस्थान )

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